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बैकुंठ चतुर्दशी मेला: अक्षत नाट्य संस्था गोपेश्वर की प्रस्तुति से दर्शक हुए मंत्रमुग्ध

श्रीनगर में बैकुंठ चतुर्दशी मेले में अक्षत नाट्य संस्था द्वारा जागर शैली में मंचित गोरील कथा को दर्शकों द्वारा भरपूर सराहना प्राप्त हुयी।

अमित कुमार के जागर गायन साथ में पारम्परिक वाद्ययंत्र ढोल-दमों, हुड़का, थाली के अदभुत मिश्रण एवं कलाकारों के बेहतरीन नृत्य एवं अभिनय ने इस प्रस्तुति को उत्कृष्ट बना दिया।

गोरिल कथा में न्याय के देवता गवरील के जन्म को जागर शैली में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें राजा झालुराई की आठ रानियों में से किसी भी रानी की कोई भी संतान न होने से राजा झालुराई बहुत दुखी रहता है।

एक दिन वो अपनी सबसे छोटी रानी कलंदरा को उसके धर्मभाई शिवजी के पास भेजता है। शिवजी द्वारा वरदान के रूप में एक सेब रानी कलंदरा को दिया जाता है। रानी कलंदरा इस सेब के आठ हिस्से कर सभी रानियों को खिलाती है और स्वयं भी खाती है।

कलंदरा के अतिरिक्त सभी सात रानियों की संताने मछली, छिपकली, मगरमच्छ, केकड़ा, चूहा आदि के रूप में होती है जिससे रानियां तथा राजा बहुत दुखी हो जाता है।

राजा की आठवीं रानी कलंदरा की प्रसव पीड़ा के समय सातों रानियां षड्यंत्र रचती हैं। उन्हें भय होता है अगर कलंदरा एक जीवित एवं स्वस्थ बच्चे को जन्म देगी तो राजा उसे अधिक महत्व देगा और उनसे मोह कम हो जायेगा।

फलतः सातों रानियां प्रसव के समय कलंदरा की आँखों में पट्टी बांध देती है। कलंदरा एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है रानियां उसे बताती है कि उसने सिलोटा और बिलोटा(सील बट्टा) को जन्म दिया है और बच्चे को एक सोने के संदूक में बंद कर काली गंगा में बहा देती है।

संदूक एक मछुआरे के जाल में फंस जाता है। मछुआरा जब संदूक खोलता है तो उसे बच्चा दिखाई देता है। निःसंतान मछुआरा बहुत खुश होता है और उस बच्चे को घर लाकर उसका लालन-पालन करता है।

वह बालक बहुत सुन्दर गौरवर्ण का होता है जिससे उसका नाम गोरिल रखा जाता है। बालक के अंदर अदभुत शक्तियों का भण्डार होता है। बालक की बुद्धि विलक्षण एवं दयालु प्रकृति का बालक कई चमत्कार दिखने लगता है।

मन्त्रों के द्वारा किसी भी असाध्य रोगी को ठीक करना, शारीरिक अक्षमता वाले लोगों को ठीक करना, सभी लोगों की मदद करना, किसी भी विवाद को अपनी बुद्धिमता से सुलझाकर सबको न्याय देना आदि गोरिल के लक्षणों में से एक थे।

गोरिल के स्नान करने से उसके मेल से गढदेवी की उत्पति होती है। एक बार गोरिल नदी के किनारे अपनी काठ की घोड़ी को पानी पिलाने लाता है। रानी कलंदरा जब बालक की मूर्खता पे हंसती है लेकिन गोरिल काठ की घोड़ी को पानी पिलाता है जिससे पूरी नदी सूख जाती है।

कलंदरा गोरिल के माथे पर चन्द्रवंश का निशान देखती है उस बालक पर उसकी ममता छलक जाती है। वह गोरिल को मनाकर अपने राज्य में लाकर राजा से मिलाती है गोरिल के साथ गढ्देवी भी आती है। बाद में पता चलता है कि गोरिल ही रानी का असली पुत्र है सील बट्टा नहीं। गोरिल सिलोटा और बिलोटा पर मंत्र फूंकता है जिससे कलवा का जन्म होता है फिर भैरव देवता प्रकट होते हैं।

जागर गायकी में पारंगत श्रीनगर के अमित कुमार के गवरील जागरों की अनूठी गायकी कलाकारों के नृत्य एवं अभिनय एवं विजय बशिष्ठ के निर्देशन, मंजू बिष्ट की मंच सज्जा ने प्रस्तुति को उत्कृष्ट एवं यादगार बना दिया कलाकारों में दीवान सिंह नेगी, कलावती रावत, दीपा बिष्ट, आरती नेगी, उषा नेगी, कुसुम बशिष्ठ, अंजना, कीर्ति, तनीषा, नैना, आशीष बिष्ट, अनिल सती, आयुष बशिष्ठ, हरिओम फर्शवान, अमित चमोली, प्रियांशु पटवाल आदि के अभिनय को भरपूर सराहना प्राप्त हुयी।

इसके अलावा मंच सहायक ममता भट्ट एवं मंच संचालन संस्था के समन्वयक ओमप्रकाश पुरोहित द्वारा किया गया।

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