बोलीं- मंजिल से ज्यादा रास्ता सिखाता है जीवन
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में चल रहे टूरो फेस्ट में मुख्य अतिथि विदुषी निशंक ने युवाओं को
यात्रा, अनुभव और संस्कृति से जुड़कर व्यापक दृष्टि विकसित करने का संदेश दिया।
‘यात्रा केवल मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं’
देहरादून से श्रीनगर की यात्रा का जिक्र करते हुए विदुषी निशंक ने कहा कि लोग अक्सर मंजिल तक पहुंचने की
जल्दबाजी में रास्ते से मिलने वाली सीख को भूल जाते हैं।
यात्रा व्यक्ति को धैर्य, दृष्टि और आगे बढ़ने का साहस सिखाती है।
उन्होंने पर्यटन को केवल घूमने या नए स्थान देखने तक सीमित नहीं माना।
कहा कि यात्रा से लोग तस्वीरों और यादों के साथ संस्कृति, कहानियां और अनुभव भी लेकर लौटते हैं।
तकनीक जानकारी दे सकती है, अनुभव नहीं
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गूगल मैप किसी व्यक्ति को हिमालय तक पहुंचा सकता है, लेकिन हिमालय के सामने खड़े होने की अनुभूति नहीं दे सकता।
उन्होंने कहा कि जानकारी और ज्ञान के साथ विवेक भी जरूरी है।
अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कैंब्रिज से एलएलएम करने के बाद भारत लौटने और जिला न्यायालय से करियर शुरू करने का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि सफलता का पैमाना केवल बड़ा पद या पैकेज नहीं होना चाहिए।
पैसा जरूरी है, लेकिन संतुष्टि और अपने निर्णयों के साथ खड़े रहने का भाव भी महत्वपूर्ण है।
युवाओं से संस्कृति और जड़ों से जुड़ने का आह्वान
विदुषी निशंक ने लेखक गांव की विभिन्न पहलों का उल्लेख करते हुए युवाओं से साहित्य, तकनीक, प्रकृति और अपनी संस्कृति से जुड़ने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की मूल भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में है।
युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए दुनिया को व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है।















Leave a Reply