रीजनल रिपोर्टर

सरोकारों से साक्षात्कार

केदारनाथ में घोड़ा-खच्चर लीद प्रबंधन पर विवाद

पतंजलि का करार टूटा, अब 1.5 करोड़ की नई योजना

केदारनाथ पैदल मार्ग पर घोड़ा-खच्चरों की लीद प्रबंधन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।

एक तरफ जिला प्रशासन ने पतंजलि योगपीठ के साथ हुए समझौते को

अपेक्षित परिणाम न मिलने का हवाला देकर समाप्त कर दिया है,

वहीं दूसरी तरफ सरकार ने इसी समस्या के समाधान के लिए करीब 1.5 करोड़ रुपये की

नई बायोफ्यूल परियोजना को मंजूरी दे दी है।

इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब पहले लीद प्रबंधन का काम निशुल्क किए जाने का दावा किया गया था,

तो अब करोड़ों रुपये की नई योजना की जरूरत क्यों पड़ी।

पतंजलि के साथ हुआ था निशुल्क संचालन का करार

वर्ष 2024 में रुद्रप्रयाग जिला पशुपालन विभाग और जिला पर्यटन विभाग ने

सोनप्रयाग स्लज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन के लिए पतंजलि योगपीठ (ट्रस्ट) के साथ एमओयू किया था।

समझौते के तहत ट्रस्ट को केदारनाथ पैदल मार्ग पर घोड़ा-खच्चरों की लीद का संग्रहण और निस्तारण निशुल्क करना था।

प्रशासन का दावा है कि इस व्यवस्था के लिए विभाग ने प्लांट स्थापित करने पर लाखों रुपये खर्च किए थे, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके।

प्रशासन ने क्यों खत्म किया करार

मुख्य पशु चिकित्साधिकारी रुद्रप्रयाग ने 10 अप्रैल 2026 को जारी पत्र में बताया कि पतंजलि योगपीठ ने

जुलाई 2025 में बिना पूर्व अनुमति के सोनप्रयाग स्लज ट्रीटमेंट प्लांट का संचालन बंद कर दिया था।

आरोप है कि प्लांट परिसर में लीद का ढेर जमा होता रहा,

मजदूरों को वेतन नहीं मिला और कई शिकायतों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ।

प्रशासन के अनुसार, ट्रस्ट का कोई जिम्मेदार अधिकारी कई महीनों तक प्लांट का निरीक्षण करने भी नहीं पहुंचा।

इन परिस्थितियों को देखते हुए एमओयू समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

पतंजलि ने आरोपों को किया खारिज

दूसरी ओर पतंजलि योगपीठ ने प्रशासन के आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है।

ट्रस्ट ने रुद्रप्रयाग मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को भेजे जवाब में कहा कि उसने सोनप्रयाग प्लांट के संचालन पर लगभग 39 लाख रुपये खर्च किए हैं

और इसके लिए सरकार से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली गई।

ट्रस्ट का कहना है कि बिना पूर्व नोटिस के समझौता समाप्त करना एमओयू की शर्तों का उल्लंघन है।

साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि निर्णय वापस नहीं लिया गया तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

सरकार लाई नई बायोफ्यूल योजना

इसी बीच उत्तराखंड सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए एक नई और व्यापक योजना को मंजूरी दी है।

पर्यटन विभाग के अनुसार, इस परियोजना में केवल घोड़ा-खच्चरों की लीद का प्रबंधन नहीं होगा, बल्कि लीद और चीड़ की पत्तियों (पिरूल) को मिलाकर बायोमास पैलेट तैयार किए जाएंगे।

परियोजना को हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरमेंट, इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट (HIFEED) के माध्यम से पायलट आधार पर लागू किया जाएगा। इसकी अनुमानित लागत करीब 1.5 करोड़ रुपये बताई गई है।

नई योजना और पुराने करार में क्या अंतर?

पर्यटन सचिव धीरज सिंह गर्ब्याल का कहना है कि पतंजलि के साथ हुआ समझौता केवल लीद संग्रहण और प्लांट संचालन तक सीमित था, जबकि नई योजना कहीं अधिक व्यापक है।

उनके अनुसार नई परियोजना में लीद और पिरूल दोनों का संग्रहण, प्रोसेसिंग

और उनसे पर्यावरण अनुकूल बायोफ्यूल तैयार किया जाएगा।

इस ईंधन का उपयोग केदारनाथ यात्रा मार्ग पर दुकानों, स्टोव और गर्म पानी के बॉयलरों में किया जाएगा।

महिलाओं को भी मिलेगा रोजगार

सरकार का दावा है कि इस योजना से स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों को रोजगार मिलेगा।

जखोली और नैनीडांडा ब्लॉक क्षेत्रों में पिरूल संग्रहण का कार्य महिलाओं के माध्यम से कराया जाएगा,

जिससे स्थानीय आजीविका को भी बढ़ावा मिलेगा।

मंत्री बोले- अब सरकार खुद करेगी समाधान

पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा ने कहा कि केदारनाथ यात्रा मार्ग पर घोड़ा-खच्चरों की लीद लंबे समय से बड़ी चुनौती बनी हुई है।

पतंजलि के साथ किए गए समझौते से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, इसलिए अब सरकार अपनी व्यापक योजना के माध्यम से इस समस्या का स्थायी समाधान तलाश रही है।

वहीं रुद्रप्रयाग जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने कहा कि अनुबंध की शर्तें पूरी न होने के कारण करार समाप्त किया गया है।

नई योजना पर्यावरण संरक्षण, जंगलों को आग से बचाने और वैकल्पिक ऊर्जा उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित होगी।

https://youtu.be/9Uh5mRbFCJk?si=k5xZf_jBDQ-8Gz_9
https://regionalreporter.in/rahul-gandhi-visit-uttrakhand/
Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *