कमल रावत
छह माह से चला पांडव नृत्य अनुष्ठान हुआ सम्पन्न
फिलहाल हमने छह माह से माता कुंती के आंगन में पांडवों और नारायण की उपस्थिति का आनंद लिया है।
इतना बड़ा आयोजन, इतने सारे लोगों का सामूहिक प्रयास।
बिना श्रद्धा, परंपराओं के निर्वाह की जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता के ऐसा छह माह का पांडव नृत्य आयोजन सम्पन्न नहीं हुआ होगा।
बारिश के बीच हुआ भावुक समापन
….समापन पर बारिश की झमाझम चल रही थी।
छह माह के इस आयोजन ने कड़ाके की ठंड, तपती दोपहर और अब उमड़ता सावन देखा है। आस्था में मौसम कहाँ बाधा बनते हैं?
पांडव पश्वाओं की ऊर्जा और श्रद्धा का अद्भुत संगम
विभिन्न तालों पर अवतरित होते, थिरकते, गर्जते पांडव पश्वा और देवताओं की ऊर्जा-शक्ति महसूस करने लोग कई बार यहां आए और आशीष लेकर गए।
धन्य है वह पटांगण, पठाले, वह छह माह से भड़भड़ा कर जलता अगेठा, नियम-धर्म, तिथि-बिथि पर अडिग, विनम्र और श्रद्धावान ग्रामीण।
दो चीड़ के वृक्ष लाने में दिखी सामूहिक शक्ति
….गांव के परली पार पहाड़ी से दो चीड़ के वृक्ष जड़ सहित उखाड़ लाने में सैकड़ों हाथ लगे। कहावत है ‘जने-जने की लकड़ी, एक जने का बोझ।’
यहां श्रद्धालुओं द्वारा पेड़ चार किलोमीटर सकुशल कुंती माता के आंगन में, वीरों के बजते ढोल-दमाऊं के साथ, तिनके के समान उठाकर ले आए।
वीरता, जोश और उत्साह का अनूठा प्रदर्शन। मानो हम मध्यकाल में जी रहे हों और आनंदित हो रहे हों।
‘गैंडी’ या गैंडावध पांडव नृत्य की अनूठी परंपरा
पौड़ी गढ़वाल में ‘गैंडी’ या गैंडावध पांडव नृत्य का मुख्य अवयव रहा है।
महाभारत का यह प्रकरण राजा पांडु से संबंधित है। इसमें अर्जुन को अपने पिता के तर्पण हेतु गैंडे का वध कर उसके जबड़े को लाना होता है, जहां उसे उसी के पुत्र नागमल से भिड़ना पड़ता है।
गैंडे की रक्षा करने में नागमल की पुत्रियां बड़ा सहयोग करती हैं।
राजढोलियों और आयोजनकर्ताओं को साधुवाद
जय वृद्धि हो तुम्हारी, राजढोलियों। तुम्हारे दम पर छह माह से पांडव आंगन उतरे। देव-स्तुति हुई।
तुम्हारे बल पर संस्कृति का निर्वाह हो रहा है। ढोलसागर विधा को संजोए रखने की जिम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर है।
तमलाग और कुंजेठा के आयोजनकर्ताओं को गढ़देश की तरफ से साधुवाद। जयवृद्धि हो तुम्हारी।
अब कुंडी में चलेगा छह माह का पांडव नृत्य
….माता कुंती के मायके कुंडी से मैती आए थे। एक चीड़ वृक्ष और दोण-कंडी, यथासंभव दान-दक्षिणा के साथ, वे विदा किए गए।
अब कुंडी में छह माह तक पांडव नृत्य चलेगा। जय हो।
बारह वर्षों का इंतजार फिर शुरू
….बारह वर्ष बहुत होते हैं, नारायण। पूरा एक युग। वर्तमान पीढ़ी तब तक आगे बढ़ चुकी होगी।
बच्चे वयस्क हो चुके होंगे, वयस्क अधेड़ और बुजुर्गों में से कुछ ही बचेंगे। तकनीक नई आ चुकी होगी।
आज से सब सूना-सूना रहेगा। आंगन, अनुष्ठान, ढोल-दमाऊं की थाप, पांडव वार्ता… सब कुछ।
फिर भी श्रद्धा जस की तस रहेगी, नारायण। इंतजार रहेगा नए आयोजन का, नए युग तक।
वैसे महाभारत भी तो युगों-युगों से प्रदर्शित होती चली आ रही है। इसी बहाने मौरी के नारायण के दर्शन हो जाते तो हैं।















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