उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
चमोली के पिनाऊं गांव में गर्भवती महिला को डंडी-कंडी और कुर्सी के सहारे अस्पताल पहुंचाने की घटना ने ग्रामीण क्षेत्रों की मुश्किलें सामने ला दी हैं।
पिछले एक महीने में भी राज्य के अलग-अलग जिलों से ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं।
चमोली में गर्भवती को छह किलोमीटर डंडी-कंडी से ले गए ग्रामीण
चमोली के देवाल क्षेत्र में पिनाऊं गांव की 33 वर्षीय गर्भवती खिमली देवी की तबीयत बिगड़ने पर
ग्रामीणों को उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए करीब छह किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
सड़क सुविधा नहीं होने के कारण महिला को पहले डंडी-कंडी और फिर कुर्सी के सहारे सड़क तक पहुंचाया गया।
ग्रामीणों ने बताया कि महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए हेली सेवा की कोशिश भी की गई थी।
हालांकि, कम विजिबिलिटी के कारण हेलीकॉप्टर आधे रास्ते से लौट गया। इसके बाद ग्रामीणों ने पैदल और वाहनों के सहारे महिला को देर रात देवाल अस्पताल पहुंचाया।
ग्रामीणों के अनुसार, देवाल में डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे। महिला को आगे जिला अस्पताल बागेश्वर रेफर किया गया।
एंबुलेंस के लिए भी इंतजार करना पड़ा। इस घटना ने सड़क सुविधा के साथ ही दुर्गम क्षेत्रों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर सवाल खड़े किए हैं।
सड़क को मंजूरी, लेकिन गांव तक पहुंचना अब भी बाकी
ग्राम प्रधान लखपत दानू के अनुसार, पिनाऊं गांव के लिए सड़क की मांग लंबे समय से उठती रही है।
लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता मनीष डोगरा ने बताया कि सड़क स्वीकृत है और वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया चल रही है।
विभाग ने धुराधारकोट-वांक-पिनाऊं मार्ग का भी उल्लेख किया है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को आज भी डोली या कुर्सी के सहारे सड़क तक पहुंचाना पड़ता है।
ऐसे में पिनाऊं की घटना केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की चुनौती बनकर सामने आई है।
चमोली में इससे पहले भी गर्भवती को दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा
21 अगस्त 2026 को चमोली के पीपलकोटी क्षेत्र से भी ऐसी ही घटना सामने आई थी।
प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद हेमा देवी को अस्पताल ले जाना जरूरी था, लेकिन भूस्खलन के कारण सड़क बंद थी।
ऐसे में आशा कार्यकर्ता और परिजनों ने महिला को पैदल पगना गांव तक पहुंचाने का निर्णय लिया।
रिपोर्ट के अनुसार, महिला को दुर्गम रास्ते से करीब दस किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया गया।
रास्ते में उफनते गदेरे भी पार करने पड़े।
यह घटना बताती है कि सड़क होने के बावजूद बरसात में मार्ग बंद होने पर ग्रामीणों के सामने इलाज तक पहुंचने की चुनौती बनी रहती है।
चंपावत में घायल ग्रामीण को चार घंटे डोली में ले गए
9 अगस्त 2026 को चंपावत के लोहाघाट क्षेत्र के पाटी ब्लॉक में सड़क सुविधा से वंचित गांव की तस्वीर सामने आई।
ग्राम पंचायत गागर के तोक साला रज्यूड़ा में बैल के हमले में घायल कैलाश भट्ट को ग्रामीणों ने डोली में बैठाकर करीब चार घंटे तक पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव तक सड़क नहीं होने के कारण किसी भी आपात स्थिति में मरीज को इसी तरह सड़क तक लाना पड़ता है।
उन्होंने सड़क निर्माण की मांग उठाई। यह घटना भी बताती है कि पहाड़ के कई गांवों में सड़क सुविधा आज भी केवल सरकारी योजनाओं और प्रस्तावों तक सीमित है।
अल्मोड़ा में बुजुर्ग महिला को सड़क तक पहुंचाने में लगे चार घंटे
19 अगस्त 2026 को अल्मोड़ा के सल्ट विकासखंड के सिंगरौं गांव में 77 वर्षीय सरस्वती देवी की तबीयत बिगड़ गई।
गांव तक सड़क नहीं होने के कारण परिजनों को उन्हें करीब ढाई किलोमीटर के दुर्गम पैदल रास्ते से सड़क तक पहुंचाने में चार घंटे से अधिक समय लगा।
परिजनों ने बताया कि रास्ता इतना संकरा और खराब था कि महिला को कंधों के सहारे ले जाना भी मुश्किल हो गया।
इसके बाद उन्हें निजी वाहन से उपचार के लिए काशीपुर ले जाया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सड़क नहीं होने के कारण बुजुर्गों और बीमार लोगों को हर बार इसी तरह की परेशानी उठानी पड़ती है।
पिथौरागढ़ में वायरल और डायरिया के बीच हेलीकॉप्टर से पहुंची स्वास्थ्य टीम
5 अगस्त 2026 को पिथौरागढ़ के मुनस्यारी क्षेत्र के दूरस्थ कनार गांव में वायरल और डायरिया का प्रकोप सामने आया।
करीब दो हजार की आबादी वाले गांव में 255 से अधिक ग्रामीण बीमारी से जूझ रहे थे।
सड़क सुविधा नहीं होने के कारण स्वास्थ्य विभाग की टीम को हेलीकॉप्टर से गांव पहुंचाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, गांव तक पहुंचने के लिए एकमात्र पैदल मार्ग है।
बरसात में रास्ता और अधिक कठिन हो जाता है।
ऐसे में बीमार ग्रामीणों को समय पर अस्पताल पहुंचाना बड़ी चुनौती बन जाता है।
स्वास्थ्य टीम ने गांव में पहुंचकर मरीजों का इलाज किया।
पिथौरागढ़ में स्वास्थ्य कर्मी भी मौसम के कारण गांव में फंसे
9 अगस्त 2026 को पिथौरागढ़ के मुनस्यारी क्षेत्र के रालम गांव में बीमार ग्रामीणों का
इलाज करने गई स्वास्थ्य विभाग की टीम मौसम खराब होने के कारण तीसरे दिन भी वापस नहीं लौट सकी।
हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर पाया था।
यह घटना बताती है कि दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच केवल सड़क और अस्पतालों तक सीमित नहीं है।
कई बार स्वास्थ्य कर्मियों और आवश्यक चिकित्सा सहायता को भी मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का है
पिछले एक महीने में सामने आई इन घटनाओं में एक बात समान है।
कहीं मरीज को डंडी-कंडी से सड़क तक पहुंचाना पड़ा, कहीं भूस्खलन के कारण रास्ता बंद रहा
और कहीं हेलीकॉप्टर सेवा मौसम के कारण उपलब्ध नहीं हो सकी।
इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि दुर्गम गांवों में सड़क सुविधा, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता और आपातकालीन परिवहन व्यवस्था को कितना मजबूत किया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं और घोषणाएं अपनी जगह हैं,
लेकिन बीमारी या प्रसव जैसी आपात स्थिति में उन्हें तत्काल इलाज तक पहुंचने की सुविधा चाहिए।
पिनाऊं की घटना के बाद एक बार फिर यही सवाल सामने है कि आखिर पहाड़ के ग्रामीणों को इलाज के लिए
डंडी-कंडी, कुर्सी और पैदल रास्तों का सहारा कब तक लेना पड़ेगा।















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