2016 के आदेश से बदली तस्वीर
रावल भीमाशंकर लिंग ने परंपरा पर दी सफाई
केदारनाथ धाम के धार्मिक प्रतीक रूप छड़ को महाराष्ट्र ले जाने को लेकर उठे विवाद में अब नया मोड़ आ गया है।
सामने आए दस्तावेजों से पता चला है कि जिस परंपरा के टूटने की बात कही जा रही थी,
उसमें वर्ष 2016 में ही बदलाव कर दिया गया था।
इस बीच केदारनाथ मंदिर के रावल भीमाशंकर लिंग ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है।
2016 के आदेश से बदली व्यवस्था
हाल ही में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2016 में जारी एक आदेश में यह व्यवस्था
की गई थी कि विशेष धार्मिक अवसरों पर रूप छड़ को धाम से बाहर ले जाया जा सकता है।
दरअसल, कुछ दिन पहले केदारनाथ मंदिर से जुड़े धार्मिक प्रतीक रूप छड़ को
एक धार्मिक कार्यक्रम के लिए महाराष्ट्र ले जाने पर विवाद खड़ा हो गया था।
कई लोगों ने इसे परंपरा के खिलाफ बताते हुए विरोध जताया था।
विरोध करने वालों का कहना था कि वर्ष 2000 के बाद से रूप छड़ को धाम से बाहर
ले जाने की परंपरा समाप्त हो चुकी है। लेकिन अब सामने आए दस्तावेजों ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रावल भीमाशंकर लिंग ने दी सफाई
केदारनाथ धाम के रावल भीमाशंकर लिंग ने कहा कि रूप छड़ रावल का
एक धार्मिक आभूषण और सम्मान का प्रतीक है।
उनके अनुसार, धार्मिक परंपराओं के तहत रावल कुछ विशेष प्रतीकों और आभूषणों
के साथ धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं।
ऐसे में रूप छड़ को किसी धार्मिक आयोजन में ले जाना परंपरा का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
नांदेड़ के धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे रावल
बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अनुसार, रावल भीमाशंकर लिंग
धार्मिक परंपराओं के अनुसार मुकुट और रूप छड़ी के साथ धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं।
समिति ने बताया कि वर्ष 2016 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम
में भी रावल मुकुट और रूप छड़ी के साथ शामिल हुए थे।
इसी परंपरा के तहत इस वर्ष 5 फरवरी से 12 फरवरी तक नांदेड़ में आयोजित
शिव कथा और विश्व शांति यज्ञ में भी रावल ने भाग लिया।
कार्यक्रम के बाद सुरक्षित रखा गया प्रतीक
बीकेटीसी के अनुसार कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुकुट और रूप छड़ी को सुरक्षित रूप से
शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर के कार्यालय में जमा कर दिया गया है।
समिति का कहना है कि पूरी प्रक्रिया धार्मिक परंपराओं और नियमों के अनुरूप ही की गई है।
अलग-अलग पक्षों की राय से जारी है विवाद
हालांकि इस मामले में अभी भी अलग-अलग पक्षों की राय सामने आ रही है।
कुछ लोग इसे धार्मिक परंपरा से जुड़ा विषय मानते हुए विरोध जता रहे हैं।
वहीं, 2016 के आदेश के सामने आने के बाद विवाद की दिशा बदलती हुई दिखाई दे रही है।
















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