दीपा तिवारी
बसभीड़ा की राधिका तिवारी को अंतिम विदाई, देहदान कर मानवता की मिसाल बनीं
अल्मोड़ा जनपद के बसभीड़ा गांव निवासी 85 वर्षीय राधिका तिवारी का 3 जुलाई 2026 को निधन हो गया।
उन्होंने अपने जीवनकाल में ही मेडिकल कॉलेज के लिए देहदान का संकल्प लिया था। निधन के बाद मेडिकल कॉलेज अल्मोड़ा
की टीम ने आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर उनकी देह शोध एवं चिकित्सा शिक्षा के लिए ग्रहण की।
अंतिम विदाई के दौरान ग्रामीणों ने “देहदान, देहदान, मानवता का हो कल्याण” के नारों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि दी।
दीपा तिवारी ने लिखा भावुक अंतिम संदेश
सोशल मीडिया पर अपनी सास राधिका अम्मा के साथ मां-बेटी जैसे रिश्ते के लिए पहचानी जाने वाली शिक्षिका एवं समाजसेवी
दीपा तिवारी ने उनकी स्मृति में एक भावुक पत्र साझा किया। उन्होंने लिखा कि अम्मा केवल उनकी सास नहीं थीं, बल्कि उनके
जीवन की सबसे मजबूत नींव और मां समान सहारा थीं।
“मेरा शरीर भी किसी के काम आ जाए”– यही थी अम्मा की अंतिम इच्छा
दीपा तिवारी ने बताया कि वर्ष 2023 में उन्होंने स्वयं अपने निधन के बाद देहदान का संकल्प लिया था।
जब यह बात परिवार में हुई तो राधिका तिवारी ने सहज भाव से कहा कि यदि उनका शरीर भी किसी के काम आ सके तो इससे
बड़ा सौभाग्य क्या होगा। इसके बाद परिवार ने कानूनी प्रक्रिया पूरी कर उनका भी देहदान पंजीकृत कराया।
अंधविश्वासों के बीच भी नहीं डगमगाया फैसला
दीपा तिवारी ने बताया कि कई लोगों ने धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर राधिका तिवारी को देहदान का निर्णय बदलने के
लिए समझाने का प्रयास किया। लेकिन परिवार ने उन्हें वैज्ञानिक सोच और मानव सेवा का महत्व समझाया। अंततः उन्होंने
अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया।
संघर्षों से भरा जीवन, लेकिन अंत तक सेवा का संकल्प
दीपा तिवारी ने अपने पत्र में राधिका तिवारी के संघर्षपूर्ण जीवन का भी उल्लेख किया।
कम उम्र में पति का निधन, कठिन परिस्थितियों में बेटे का पालन-पोषण और जीवनभर अनेक चुनौतियों का सामना करने के
बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। समय के साथ परिवार में प्रेम और विश्वास का रिश्ता और मजबूत होता गया, जिसने सास-
बहू के रिश्ते को मां-बेटी के रिश्ते में बदल दिया।
“अम्मा चली गईं, लेकिन हमेशा जिंदा रहेंगी”
दीपा तिवारी ने लिखा कि 3 जुलाई को दोपहर 12:30 बजे अम्मा ने उनकी गोद में अंतिम सांस ली।
उन्हें इस बात का संतोष है कि अंतिम संस्कार में शरीर को अग्नि के हवाले करने के बजाय उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और
मानवता के लिए समर्पित किया। उन्होंने कहा कि अब राधिका अम्मा हर उस डॉक्टर की सीख और ज्ञान में जीवित रहेंगी,
जो उनके शरीर पर अध्ययन कर भविष्य में लोगों का उपचार करेगा।
समाज के लिए प्रेरणा बना देहदान का संदेश
राधिका तिवारी की देहदान की पहल को समाज में मानव सेवा और वैज्ञानिक सोच का प्रेरणादायक उदाहरण माना जा रहा है।
सोशल मीडिया पर लाखों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके इस निर्णय को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया है।















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