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सरोकारों से साक्षात्कार

उक्रांद में फिर क्यों गहराया अंदरूनी संकट

आशुतोष नेगी प्रकरण ने 2027 से पहले खड़े किए बड़े सवाल

उत्तराखंड क्रांति दल कभी केवल एक राजनीतिक पार्टी नहीं था। वह उस राजनीतिक चेतना का नाम था,

जिसने पहाड़ की अलग पहचान को राज्य आंदोलन की आवाज से जोड़ा।

आज वही उक्रांद एक बार फिर अपने भीतर के विवाद को लेकर चर्चा में है।

इस बार केंद्र में वरिष्ठ नेता आशुतोष नेगी हैं।

27 अगस्त 2026 को जारी अनुशासनात्मक आदेश के मुताबिक नेगी की प्राथमिक सदस्यता समाप्त करते हुए उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित किया गया है।

पार्टी की अनुशासन समिति ने उन पर वरिष्ठ नेताओं को लेकर कथित भ्रामक और तथ्यहीन बयान देने तथा दल विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए हैं।

इससे पहले उन्हें केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से भी हटाया गया था।

लेकिन इस कार्रवाई को केवल एक नेता के निष्कासन तक सीमित करके देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी।

असली सवाल यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उक्रांद में फिर ऐसा टकराव क्यों पैदा हुआ?

जिस नेता को साथ लेकर चुनाव की तैयारी हो रही थी, वही अब बाहर

इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कुछ ही सप्ताह पहले आशुतोष नेगी उक्रांद के सक्रिय राजनीतिक अभियान का हिस्सा थे।

अगस्त क्रांति दिवस पर जागेश्वर में कांग्रेस नेता दिनेश कुंजवाल के उक्रांद में शामिल होने के कार्यक्रम में नेगी भी मौजूद थे।

उस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय दलों पर निशाना साधते हुए क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करने की जरूरत बताई थी।

मार्च और मई 2026 की पार्टी गतिविधियों में भी नेगी केंद्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर संगठन के कार्यक्रमों में दिखाई दिए।

उक्रांद लगातार सदस्यता अभियान और 2027 की तैयारियों को आगे बढ़ाने का दावा कर रहा था।

यानी तस्वीर अचानक नहीं बदली।

पहले संगठन विस्तार, फिर नेतृत्व के भीतर मतभेद और उसके बाद निष्कासन-यह क्रम अब पार्टी की राजनीतिक दिशा पर सवाल खड़े कर रहा है।

कुकरेती का 2027 में सरकार बनाने का दावा और सामने आई चुनौती

उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती लगातार 2027 को लेकर आक्रामक राजनीतिक दावा करते रहे हैं।

मार्च 2026 में उन्होंने रुड़की के कार्यकर्ता सम्मेलन में कहा था कि विधानसभा चुनाव के बाद उक्रांद राज्य में सरकार बनाएगी।

पार्टी रोजगार, पलायन, जल-जंगल-जमीन और क्षेत्रीय मुद्दों को अपने अभियान के केंद्र में रखने की बात कह रही है।

हाल के महीनों में दूसरे दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को उक्रांद में शामिल कराने की कोशिशें भी दिखाई दी हैं।

अगस्त में कांग्रेस से जुड़े दिनेश कुंजवाल के उक्रांद में आने को इसी चुनावी विस्तार की कड़ी के रूप में देखा गया।

ऐसे समय में पार्टी के एक चर्चित युवा चेहरे का छह साल के लिए निष्कासन संगठन के लिए सामान्य अनुशासनात्मक मामला नहीं माना जा सकता।

यह सीधे 2027 की रणनीति और नेतृत्व की कार्यशैली से जुड़ा सवाल बन गया है।

क्या उक्रांद फिर वही गलती दोहरा रहा है?

उक्रांद का इतिहास इस सवाल को और गंभीर बना देता है।

2011-12 के दौरान पार्टी में त्रिवेंद्र सिंह पंवार और दिवाकर भट्ट के नेतृत्व वाले धड़ों के बीच विवाद इतना बढ़ा कि मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया।

आयोग के रिकॉर्ड में दोनों गुटों के अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न दर्ज हुए।

2013 तक पार्टी के विभाजन का असर इतना गहरा हो चुका था कि इंडिया टुडे ने उक्रांद को दो प्रमुख धड़ों में बंटे दल के रूप में रिपोर्ट किया।

पार्टी के मूल चुनाव चिह्न ‘कुर्सी’ को भी विवाद के चलते फ्रीज किया गया था।

2015 में दोनों प्रमुख धड़ों के एक मंच पर आने की कोशिश भी हुई।

काशी सिंह ऐरी और त्रिवेंद्र सिंह पंवार गुटों के एकीकरण की घोषणा हुई, लेकिन कुछ ही समय बाद फिर मतभेद सामने आ गए।

यानी उक्रांद की समस्या केवल आज की नहीं है।

पिछले डेढ़ दशक का इतिहास बताता है कि संगठन के भीतर नेतृत्व और वर्चस्व का सवाल कई बार पार्टी की राजनीतिक ताकत पर भारी पड़ा है।

काशी सिंह ऐरी की पुरानी स्वीकारोक्ति आज फिर क्यों याद आ रही है?

उक्रांद के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी ने एक पुराने साक्षात्कार में पार्टी के हाशिये पर जाने की जिम्मेदारी से खुद को अलग नहीं किया था।

उन्होंने कहा था कि वरिष्ठ नेतृत्व की गलतियों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया।

उसी बातचीत में उन्होंने दिवाकर भट्ट के दौर के विभाजन को भी उक्रांद की कमजोरी का बड़ा कारण बताया था।

इस पुराने बयान को आज के घटनाक्रम से जोड़कर देखना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी के सामने फिर वही चुनौती खड़ी दिखाई दे रही है।

क्या उक्रांद असहमति को संगठन के भीतर संभाल पाएगा या असहमति फिर धड़ेबंदी का रास्ता बनाएगी?

आशुतोष नेगी को ‘बलि का बकरा’ कहना अभी जल्दबाजी

आशुतोष नेगी के निष्कासन को राजनीतिक साजिश या ‘बलि का बकरा’ कहना अभी तथ्यों से साबित नहीं होता।

पार्टी के पास उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का अपना पक्ष है।

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें पहले नोटिस दिया गया था

और बाद में पार्टी नेतृत्व के खिलाफ कथित बयानबाजी जारी रहने का आरोप लगाया गया।

दूसरी ओर, नेगी ने निष्कासन के बाद सोशल मीडिया पर पार्टी के भीतर अपने खिलाफ कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है। इसलिए इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग रखना जरूरी है।

लेकिन राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होता।

वायरल वीडियो और ऑडियो ने विवाद को और हवा दी

आशुतोष नेगी प्रकरण के बीच सुरेंद्र कुकरेती से जुड़े कथित वीडियो और ऑडियो को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हुई है।

कुछ स्थानीय रिपोर्टों में कथित बातचीत को लेकर संगठन के भीतर फैसलों और नेतृत्व की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।

हालांकि इन रिकॉर्डिंग की आवाज, पूरी बातचीत और संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

इसलिए इन्हें अंतिम प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

फिर भी इन वायरल सामग्री ने एक बात साफ कर दी है-उक्रांद का आंतरिक विवाद अब बंद कमरों तक सीमित नहीं है।

सोशल मीडिया के दौर में संगठन के भीतर की हर खींचतान सीधे जनता और कार्यकर्ताओं के सामने पहुंच रही है।

असली संकट नेगी नहीं, संगठन में भरोसे का है?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।

अगर किसी क्षेत्रीय दल को 2027 में भाजपा और कांग्रेस के सामने विकल्प बनना है, तो उसके पास केवल मुद्दे होना पर्याप्त नहीं होगा।

उसे संगठन, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच भरोसा भी दिखाना होगा।

उक्रांद के पास उत्तराखंडियत, मूल निवास, भू-कानून, गैरसैंण, पलायन, रोजगार

और जल-जंगल-जमीन जैसे ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर वह राष्ट्रीय दलों से अलग राजनीतिक पहचान बना सकता है।

लेकिन यदि इन्हीं मुद्दों को उठाने वाले नेता संगठन के भीतर लगातार आपसी संघर्ष में उलझे दिखाई देंगे,

तो जनता के सामने पार्टी का संदेश कमजोर पड़ सकता है।

2027 से पहले उक्रांद के सामने दोहरी चुनौती

एक तरफ उक्रांद नए लोगों को जोड़ने और चुनावी विस्तार की कोशिश कर रहा है।

दूसरी तरफ संगठन के भीतर पुराने सवाल फिर सामने आ रहे हैं।

यही विरोधाभास पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। पार्टी नए नेताओं और कार्यकर्ताओं को जोड़ रही है।

लेकिन उसी समय एक सक्रिय और चर्चित नेता को छह साल के लिए बाहर कर दिया गया है।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि आशुतोष नेगी आगे क्या करेंगे।

सवाल यह है कि क्या उक्रांद अपने प्रभावशाली चेहरों को एक मंच पर रखकर चुनाव लड़ पाएगा?

क्या संवाद की जगह अनुशासन प्रमुख हथियार बन रहा

किसी भी संगठन में अनुशासन जरूरी है।

लेकिन क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए असहमति को संभालना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

क्योंकि ऐसे दलों की ताकत अक्सर सीमित संगठन और कुछ प्रभावशाली जननेताओं पर टिकी होती है।

उक्रांद का इतिहास बताता है कि जब व्यक्तिगत मतभेद संगठनात्मक संघर्ष में बदले, तो उसका नुकसान पार्टी को हुआ।

आज परिस्थिति फिर कुछ वैसी ही दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब 2012 नहीं, 2027 सामने है।

उक्रांद के सामने सबसे बड़ा सवाल

उत्तराखंड क्रांति दल को अपने अतीत से सबसे बड़ा सबक यही लेना होगा कि जनता ने उसे केवल चुनाव लड़ने के लिए नहीं बनाया था।

राज्य आंदोलन के दौर में उसकी ताकत राजनीतिक चेतना और क्षेत्रीय अस्मिता से आई थी।

आज अगर वही पार्टी फिर मजबूत होना चाहती है तो उसे तय करना होगा कि संगठन व्यक्ति-केंद्रित होगा या मुद्दा-केंद्रित।

नेताओं के बीच मतभेद होंगे। चुनावी रणनीति पर असहमति भी होगी। लेकिन सवाल यह है कि उन मतभेदों को पार्टी किस तरीके से संभालती है।

आशुतोष नेगी का निष्कासन इस लिहाज से केवल एक अनुशासनात्मक फैसला नहीं है।

यह उक्रांद के लिए एक राजनीतिक परीक्षा भी है।

2027 से पहले क्या उक्रांद पुराने अंतर्विरोधों को पीछे छोड़कर सामूहिक नेतृत्व के साथ आगे बढ़ेगा, या फिर एक बार फिर अंदरूनी खींचतान उसकी राजनीतिक जमीन कमजोर करेगी?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—उक्रांद को चला कौन रहा है और 2027 की लड़ाई में उसके साथ कितने चेहरे खड़े रहेंगे?

इतिहास का जवाब उक्रांद के सामने है। अब फैसला वर्तमान नेतृत्व को करना है।

https://youtu.be/AVYzvlgVjws?si=-DQm3Tl6AsKfUdDg
https://regionalreporter.in/uttarakhand-bhu-kanun-eradi-144-nali-land/
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