पूछा- मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की?
CJP प्रदर्शन से जुड़े एक छात्र को 5 लाख रुपये के बॉन्ड का नोटिस जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई है।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का स्पष्ट आदेश दिया गया था,
तो इसके बावजूद नोटिस कैसे जारी किया गया।
यह मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के लॉ छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है।
उन्हें 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था।
CJI सूर्यकांत ने जताई सख्त नाराजगी
9 सितंबर को मामले का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट में हुआ। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोटिस जारी किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई।
पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
कोर्ट ने कहा कि CJP प्रदर्शन से जुड़े मामलों में छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का उसका आदेश स्पष्ट था।
CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई पर रोक लगा रखी थी, तो मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया।
कोर्ट ने संबंधित अधिकारी से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगने की बात कही है।
साथ ही नोटिस को रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया गया है।
छात्र से मांगा गया था 5 लाख का बॉन्ड
अक्षत त्रिपाठी को छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी बॉन्ड देने को कहा गया था।
इसके अलावा उनसे 5-5 लाख रुपये की दो जमानत भी मांगी गई थीं। यह नोटिस बाद में वापस ले लिया गया था।
नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS के तहत शुरू की गई कार्रवाई के आधार पर जारी किया गया था।
रिपोर्टों के मुताबिक, कार्यवाही BNSS की धाराओं 126 और 135 के तहत शुरू हुई थी।
पुलिस रिपोर्ट में छात्र पर आरोप
पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया था कि अक्षत त्रिपाठी दूसरे छात्रों को CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।
पुलिस ने उन पर सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैलाने का भी आरोप लगाया था।
रिपोर्ट में ऐसी गतिविधियों से कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी।
हालांकि अक्षत त्रिपाठी ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था।
अक्षत का यह भी दावा है कि उस समय विश्वविद्यालय करीब तीन महीने से बंद था।
इसलिए छात्रों को प्रदर्शन के लिए उकसाने के पुलिस के आरोप पर उन्होंने सवाल उठाया।
उन्होंने यह भी कहा कि 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में वह घायल हुए थे।
SFI ने भी नोटिस पर जताई थी आपत्ति
अक्षत त्रिपाठी स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी SFI की उत्तर प्रदेश राज्य समिति के सदस्य भी हैं।
नोटिस सामने आने के बाद SFI ने कार्रवाई की आलोचना की और इसे छात्रों के खिलाफ दमनात्मक कदम बताया।
CJP के सह-संयोजक सौरव दास ने भी इस मामले पर सवाल उठाए।
विवाद बढ़ने के बाद संबंधित अधिकारियों ने नोटिस वापस ले लिया। इसके बावजूद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का क्या था मामला
मामला सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें CJP के जुलाई में हुए प्रदर्शनों से संबंधित मामलों पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए थे।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, कोर्ट ने छात्रों से जुड़े मामलों में दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था।
इसी पृष्ठभूमि में 4 सितंबर को अक्षत को नोटिस जारी होने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया।
अब सुप्रीम कोर्ट संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट से इस कार्रवाई पर स्पष्टीकरण मांगेगा।
नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया है।















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