तेल कंपनियों पर बढ़ा दबाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है।
इससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर भी सवाल बढ़ गए हैं।
9 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 2.5 फीसदी चढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया।
अमेरिकी WTI क्रूड भी करीब 2 फीसदी बढ़कर 95 डॉलर के आसपास पहुंच गया।
कच्चे तेल में यह तेजी पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंता के बीच आई है।
इससे भारत के लिए कच्चा तेल खरीदना महंगा हो रहा है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा?
अभी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की कोई पुष्टि नहीं है।
दिल्ली में 9 सितंबर को पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर ही रहा।
सरकारी PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, दोनों दरें अभी स्थिर हैं।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो तेल कंपनियों पर कीमतों में बदलाव का दबाव बढ़ सकता है।
Financial Express की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों के संकेत हैं कि क्रूड के लगातार 110 डॉलर प्रति
बैरल से ऊपर रहने पर कीमतों में बदलाव की जरूरत ज्यादा गंभीर हो सकती है।
फिलहाल तत्काल बढ़ोतरी की संभावना कम बताई गई है।
तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर कितना नुकसान?
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू पंप कीमतों के स्थिर रहने से सरकारी तेल कंपनियों का मार्केटिंग मार्जिन दबाव में है।
Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में अब तक तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब
5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 23 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।
Financial Express ने भी शुरुआती सितंबर के आंकड़ों के आधार पर पेट्रोल पर करीब 4.2 रुपये
और डीजल पर करीब 24.9 रुपये प्रति लीटर का नकारात्मक मार्केटिंग मार्जिन बताया है।
यानी कंपनियां जिस कीमत पर ईंधन बेच रही हैं, उस कीमत पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की मौजूदा लागत के मुकाबले उनका मार्जिन काफी दबाव में है।
भारत का क्रूड बास्केट भी 100 डॉलर के पार
भारत के लिए चिंता सिर्फ ब्रेंट के 100 डॉलर पार जाने की नहीं है। भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत भी तेजी से बढ़ी है।
PPAC के आंकड़ों के अनुसार, 8 सितंबर को भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत
108.91 डॉलर प्रति बैरल रही। सितंबर में अब तक इसका औसत करीब 102.11 डॉलर है।
इसके मुकाबले अगस्त में भारतीय क्रूड बास्केट का औसत 90.19 डॉलर और जुलाई में 82.04 डॉलर प्रति बैरल था।
इसका मतलब है कि भारत के लिए कच्चे तेल की वास्तविक आयात लागत भी पिछले दो महीनों की तुलना में काफी बढ़ गई है।
भारत पर बढ़ सकता है आयात बिल
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है।
महंगा क्रूड डॉलर की मांग बढ़ाता है और रुपये पर भी दबाव डाल सकता है।
9 सितंबर को रुपये की कीमत भी 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से नीचे चली गई थी।
अगर क्रूड लंबे समय तक महंगा रहा तो इसका असर पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा।
परिवहन, विमानन, पेंट, टायर, केमिकल और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की लागत भी बढ़ सकती है।
तो क्या पेट्रोल फिर महंगा होगा?
फिलहाल इसका सीधा जवाब नहीं है। क्रूड के 100 डॉलर पार जाने से पेट्रोल-डीजल महंगा होने का दबाव जरूर बढ़ा है, लेकिन तत्काल कीमत बढ़ाने का फैसला सामने नहीं आया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड कितने समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहता है।
अगर पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ता है और कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो घरेलू ईंधन कीमतों में बदलाव का दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि 9 सितंबर तक दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये
और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर हैं।















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