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गढ़वाल की रोपाई परंपरा: श्रम, संस्कृति और सामूहिकता का अनूठा उत्सव

अभिषेक रावत

गढ़वाल की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता या धार्मिक आस्था से नहीं है, बल्कि यहां की कृषि परंपराएं भी इसकी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

आषाढ़ का महीना शुरू होते ही पहाड़ के खेतों में रोपाई का दौर शुरू हो जाता है।

यह केवल धान लगाने का कार्य नहीं, बल्कि श्रम, सहयोग, लोकगीत और परंपराओं का जीवंत उत्सव है।

ब्यूंण से शुरू होती है रोपाई की तैयारी

रोपाई की प्रक्रिया आषाढ़ में नहीं, बल्कि बैसाख से ही शुरू हो जाती है।

इस दौरान किसान धान की नर्सरी तैयार करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में “ब्यूंण” कहा जाता है।

गोबर और मिट्टी से तैयार क्यारियों में बीज बोए जाते हैं।

परंपरागत रूप से शुभ नक्षत्रों में बीज बोने की मान्यता आज भी कई गांवों में कायम है।

परमरा: सामूहिक श्रम की अनूठी मिसाल

गढ़वाल की रोपाई का सबसे खास पहलू “परमरा” है।

इसके तहत गांव के लोग एक-दूसरे के खेतों में बिना मजदूरी के काम करते हैं। आज किसी के खेत में रोपाई होती है तो कल दूसरे के खेत में।

यह परंपरा न केवल खेती को आसान बनाती है, बल्कि सामाजिक एकता को भी मजबूत करती है।

महिलाओं के कंधों पर टिकी है रोपाई

रोपाई के दौरान महिलाओं की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है।

घर की जिम्मेदारियों के साथ खेतों में घंटों तक पानी और कीचड़ के बीच काम करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा होता है।

धान के पौधों को कतारबद्ध ढंग से रोपने की कला में महिलाएं विशेष दक्षता रखती हैं।

लोकगीतों से गूंजते हैं खेत

गढ़वाल में रोपाई केवल श्रम नहीं, बल्कि उत्सव भी है। खेतों में काम के दौरान महिलाएं पारंपरिक रोपाई गीत गाती हैं।

इन गीतों में परिवार, रिश्तों, प्रकृति और देवी-देवताओं का उल्लेख होता है।

लोकगीत श्रम को आनंद में बदल देते हैं और सामूहिकता की भावना को मजबूत करते हैं।

धार्मिक आस्था से भी जुड़ी है परंपरा

रोपाई शुरू करने से पहले भूमि देवता की पूजा की जाती है।

कई गांवों में पहला पौधा सबसे बुजुर्ग महिला द्वारा रोपने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।

मान्यता है कि इससे फसल अच्छी होती है और खेतों में समृद्धि आती है।

बदलते दौर में चुनौतियों का सामना

पलायन, श्रमिकों की कमी और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से पारंपरिक रोपाई प्रभावित हुई है।

कई गांवों में खेत खाली पड़े हैं, लेकिन जो किसान आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं,

वे जैविक खेती और पारंपरिक धान की किस्मों को संरक्षित करने का काम कर रहे हैं।

संस्कृति को जीवित रखने वाली परंपरा

रोपाई केवल कृषि कार्य नहीं, बल्कि गढ़वाल के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का आधार है।

यह परंपरा लोगों को मिलकर काम करना, प्रकृति का सम्मान करना और सामूहिक जीवन के महत्व को समझाती है।

पहाड़ में आज भी यह कहावत प्रचलित है— “धान रोपदा, संस्कृति जोपदा”, यानी धान के साथ संस्कृति भी बोई जाती है।

https://regionalreporter.in/uttarakhand-tribhuvan-cooperative-university-pmu-mou/
https://youtu.be/xi720jCgQyA?si=4hdjkAEIejDwGsXY

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