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मुस्लिम बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित करने की मांग

Supreme Court of India ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (पॉलिगैमी) की प्रथा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

याचिका में दावा किया गया है कि यह प्रथा संविधान के समानता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है।

केंद्र सरकार को नोटिस, लंबित मामलों के साथ होगी सुनवाई

भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिला अधिकार कार्यकर्ताओं

Zakia Soman और Noorjehan Safia Niaz सहित अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

दालत ने इस याचिका को पहले से लंबित समान मामलों के साथ जोड़ दिया है।

याचिका में क्या-क्या मांगें की गई

याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह को मिलने वाली छूट समाप्त की जाए

और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू की जाए, जिसके तहत बहुविवाह दंडनीय अपराध है।

इसके अलावा याचिका में केंद्र सरकार को बहुविवाह की प्रथा समाप्त करने के लिए कानून बनाने

और धर्म की परवाह किए बिना ऐसे विवाहों को प्रारंभ से ही अमान्य घोषित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।

शरिया अधिनियम की धारा 2 को दी चुनौती

याचिका में Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान मुस्लिम पुरुषों को बहुविवाह की अनुमति देकर मुस्लिम महिलाओं को अन्य नागरिकों के समान कानूनी संरक्षण से वंचित करता है।

महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की भी उठाई मांग

याचिका में पहली पत्नी और बच्चों के वैवाहिक घर पर तत्काल अधिकार सुनिश्चित करने, भरण-पोषण के मामलों में त्वरित

प्रक्रिया अपनाने तथा गुप्त रूप से होने वाले दूसरे विवाह रोकने के लिए सभी मुस्लिम विवाह

और तलाक का अनिवार्य सरकारी पंजीकरण कराने की भी मांग की गई है।

संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का हवाला

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बहुविवाह महिलाओं के साथ भेदभाव करता है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार),

अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है,

लेकिन यह संवैधानिक नैतिकता के अधीन है। इसलिए लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

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