रमन कृष्ण किमोठी
सहायक निदेशक
(इंटरनेशनल स्टूडेंट ग्लोबल रिलेशन)
रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय
आम भारतीय जनमानस से जब कभी भारत के विश्वस्त वैश्विक मित्र का प्रश्न किया जाए, तो सबसे पहला नाम रूस का ही आता है।
इसके अनेक ऐतिहासिक और सामरिक उदाहरण भी रहे हैं। दोनों राष्ट्रों ने संकट के समय अद्वितीय कूटनीतिक एवं रणनीतिक साझेदारी का परिचय दिया है।
दोनों देशों की इस साझेदारी ने कई मौकों पर विश्व राजनीति में अपने पक्ष को मजबूती प्रदान की है।
हालांकि, हाल के दिनों में अमेरिकी दबाव, युद्ध परिस्थितियों और व्यापार असंतुलन ने दोनों पक्षों को दीर्घकालिक लक्ष्यों पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया है।
ऐसे में भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की रूस यात्रा ने संभावनाओं के नए द्वार खोले हैं।
नेहरू काल से भारत-रूस संबंधों की मजबूत नींव
भारत और रूस के मैत्रीपूर्ण संबंधों का इतिहास स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों तक जाता है।
स्वतंत्र भारत ने 1947 से ही दो ध्रुवीय विश्व में रूस के समाजवादी स्वरूप को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप अपनाया। यह अपने आप में अभूतपूर्व था।
पंडित नेहरू की नीतियों में रूस के सकारात्मक सहयोग की स्पष्ट छाप दिखाई देती रही। इसमें पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर भारी उद्योगों के विकास तक कई क्षेत्र शामिल रहे।
दूसरी ओर, रूस ने कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारतीय हितों का मजबूती से संरक्षण किया।
इससे दोनों देशों के बीच दोस्ती की बुनियाद और मजबूत हुई।
बाद में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और भारत-सोवियत शांति, मैत्री एवं सहयोग संधि ने संबंधों को नई दिशा दी।
इस संधि के बाद व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुले।
हालांकि, 1991 में सोवियत रूस के विघटन ने विश्व को एक ध्रुवीय बना दिया। इससे दोनों देशों के बीच विकास और सहयोग की रफ्तार धीमी हुई।
इसके बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान वर्ष 2000 में हुई रणनीतिक साझेदारी ने संबंधों को नई ऊर्जा दी।
इसके बाद मनमोहन सिंह सरकार के दौरान वर्ष 2010 में विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी की घोषणा हुई।
इन साझा प्रयासों ने दिल्ली-मास्को संबंधों को नई मजबूती दी।
इसके बाद 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पूर्ण बहुमत सरकार के आने के साथ दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिली।
वर्ष 2014 से 2024 के बीच भारत-रूस संबंधों ने कई क्षेत्रों में नई ऊंचाइयां हासिल कीं।
रक्षा और तकनीक में बढ़ता सहयोग
रक्षा क्षेत्र में एस-400 ने भारत की वायु रक्षा प्रणाली को मजबूती दी।
वहीं, ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग और कामोव हेलीकॉप्टर ने मेक इन इंडिया के अनुरूप रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया।
इन परियोजनाओं में तकनीक हस्तांतरण पर भी जोर दिया गया।
गगनयान मिशन में रूस के सहयोग ने भारत के इसरो और रॉसकॉस्मोस के संयुक्त प्रयासों को नई ऊंचाई दी।
इसी सहयोग का असर दोनों देशों के व्यापार पर भी दिखाई दिया।
वर्ष 2014 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार करीब 10 अरब डॉलर था। आज यह बढ़कर करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
बढ़ते व्यापार के साथ चुनौतियां भी कायम
ये सभी तथ्य स्पष्ट करते हैं कि पिछले एक दशक में भारत और रूस के बीच सहयोग को नई प्रगाढ़ता मिली है।
रक्षा, व्यापार, तकनीक और सांस्कृतिक क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध मजबूत हुए हैं।
हालांकि, वर्तमान परिदृश्य में दोनों राष्ट्रों के सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका की टैरिफ नीति ने दोनों देशों के व्यापार को प्रभावित किया है। वहीं, एशिया में ईरान और यूरोप में यूक्रेन युद्ध ने भी परिस्थितियों को जटिल बनाया है।
इसके अलावा, वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व की नीति ने रूस के निवेश को भी प्रभावित किया है।
दूसरी ओर, भारत भी लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर चिंतित है।
भारत कच्चे तेल, उर्वरक और कोयले के आयात के लिए रूस पर काफी हद तक निर्भर है।
आज करीब 60 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारत का आयात 55 अरब डॉलर है। वहीं, भारत का निर्यात करीब 5 अरब डॉलर तक सीमित है।
यह व्यापार असंतुलन दोनों देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
जयशंकर की रूस यात्रा से नई उम्मीदें
इन परिस्थितियों में भारतीय विदेश मंत्री की रूस यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत-रूस अंतर सरकारी आयोग की बैठक में उनकी भागीदारी अहम है। इसके साथ ही राष्ट्रपति पुतिन से उनकी मुलाकात भी महत्वपूर्ण रही।
इस दौरान द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दिया गया।
गौरतलब है कि इसी वर्ष 12-13 सितंबर को भारत नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी भी करने जा रहा है।
ब्रिक्स सम्मेलन में डिजिटल करेंसी जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
इन मुद्दों पर भारत और रूस के रुख का सभी पक्षकारों को इंतजार है।
ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई वैश्विक चुनौतियों को सुलझाने में भारतीय विदेश मंत्री की रूस यात्रा कितनी सफल रहती है।
इस यात्रा की पहली झलक आगामी ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता में भी दिखाई दे सकती है।















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