डॉ. सुशील उपाध्याय
NHAI के साइनबोर्ड में नामों का ‘चमत्कारिक’ बदलाव
हरिद्वार के लोगों को पता भी नहीं लगा और शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में कई जगहों,
स्थानों और गांवों के नाम तक बदल गए। यह चमत्कारिक कारनामा NHAI ने किया है। कुछ उदाहरण देखिए।
दम कोठी से चंद्र चरा तक बदले नाम
गंगा की दो धाराओं के बीच बनी डैम कोठी अब ‘दम कोठी’ हो गई है। वैसे, दम भी कोई बुरा शब्द नहीं, दम है तो जान है!
भगवान चंद्राचार्य चौक का नाम ‘चंद्र चरा चौक’ हो गया है।
सार्वजनिक चर्चा के बाद चंद्र चरा को ठीक किया गया। दम कोठी को भी बदला गया, लेकिन डैम कोठी की बजाय डाम कोठी कर दिया गया।
30 किलोमीटर में 30 से ज्यादा गलतियां
हरिद्वार से रुड़की के बीच की करीब 30 किलोमीटर की दूरी में NHAI ने नाम पट्टों और संकेतकों में 30 से ज्यादा बड़ी गलतियां की हैं।
इससे पहले राष्ट्रीय राजमार्ग हो अथवा प्रांतीय मार्ग, स्थान-नामों को लेकर ऐसी गलतियां प्रायः दिखाई नहीं देती थीं।
मौजूदा गलतियों को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि NHAI के अधिकारियों या जिस एजेंसी को यह काम दिया गया हो, उसने स्थान-नामों का निर्धारण AI से कराया है।
अब AI की समझ में कुछ ऐसा आया कि उसने टोडा कल्याणपुर गांव का नाम ‘तोदा कल्याणपुर’ कर दिया।
भुक्कनपुर को ‘बुक्कं पुर’ और रोहालकी को ‘रूहलकी’ में बदल दिया गया।
हद तो यह है कि प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया का नाम वंदना कटेरिया लिख दिया गया। उनके नाम पर हरिद्वार में स्टेडियम भी है।
सरकारी बदलाव नहीं, लापरवाही का नतीजा
सामान्य जागरूक लोग भी जानते हैं कि किसी भी शहर या गांव का नाम बदलने का अधिकार संबंधित राज्य सरकार के पास होता है।
हालांकि, शहर या गांव के भीतर के मोहल्ले या बस्ती का नाम स्थानीय प्रशासन द्वारा बदला जा सकता है।
फोर लेन राजमार्ग पर हुए ये बदलाव कोई औपचारिक सरकारी बदलाव नहीं हैं। यह पूरी तरह से लापरवाही को समर्पित गतिविधि दिखाई देती है।
NHAI के राजभाषा विभाग पर भी सवाल
NHAI के पास एक भरा-पूरा राजभाषा विभाग है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर हिंदी में लिखी जाने वाली सूचनाओं के निर्धारण की जिम्मेदारी भी इसी विभाग की होती है।
अब राजभाषा विभाग की समझ यह है कि ‘दुर्घटना की आशंका’ की बजाय ‘दुर्घटना की संभावना’ लिख दिया गया है।
जबकि ‘संभावना’ शब्द का प्रयोग सकारात्मक गतिविधि के लिए होता है। नकारात्मक गतिविधि, जैसे रोड एक्सीडेंट आदि के लिए ‘आशंका’ का प्रयोग किया जाता है।
रुड़की का नाम चार अलग-अलग तरीके से
गलतियों का सिलसिला इतना व्यापक है कि उसे किसी एक पैमाने पर देखना मुश्किल है।
रुड़की शहर का नाम चार तरह से लिखा गया है—रुड़की, रूड़की, रुडकी और रूडकी।
इसी तरह मुजफ्फरनगर में कहीं नुक्ते का प्रयोग किया गया है और कहीं नुक्ते को छोड़ दिया गया है।
मुसलमानों के प्रमुख तीर्थस्थल पीरान कलियर को कहीं ‘पिरन कलियर’ और कहीं ‘पिरान कलियर’ लिखकर दायित्व की पूर्ति की गई है।
गांवों के नामों का भी बदला रूप
सबसे रोचक बदलाव गांवों के नाम में हुए हैं। ये बदलाव वैसे ही हैं, जैसे Google Maps पर अपनी भाषा में नगर या गांव का नाम देखने पर कई बार दिखाई देते हैं।
रुड़की से सटा हुआ ढंडेरा कस्बा ‘धन देरा’ हो गया।
जौरासी गांव को नया नाम ‘जौरसी’ दिया गया। इसी तरह ब्रह्मपुर को ‘बरमपुर’ में बदल दिया गया।
नदियों के नाम भी नहीं बचे
हद तो यह है कि सौलानी नदी के नाम को ‘सौलनी’ कर दिया गया।
इसी तरह देहरादून से हरिद्वार आते समय सोन्ग नदी के नाम में भी बदलाव किया गया।
इस नदी का नाम बदलकर ‘सांग’ रख दिया गया।
इसी मार्ग पर लाल तप्पड़ को ‘लाल टप्पर’ लिख दिया गया था।
बाद में लोगों के विरोध के चलते संबंधित बोर्ड को पुतवाकर सही नाम लिखवाया गया।
स्थानीय पहचान से जुड़े हैं स्थानों के नाम
शहर, गांव या उनसे जुड़े स्थान के नाम के पीछे कोई न कोई किस्सा-कहानी जुड़ी होती है।
इसलिए लोग नाम के बदलाव को लेकर काफी संवेदनशील रहते हैं।
चूंकि ये नाम कुछ दिन पहले ही लिखे गए हैं, इसलिए उनकी तरफ वैसा ध्यान नहीं गया है।
कुछ लोगों ने शायद यह मान लिया होगा कि सरकार ने ही नाम बदल दिए होंगे।
बदलाव किस स्तर तक हुए हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हर की पैड़ी को ही अलग-अलग जगह पर तीन तरह से लिखा गया है।
रोमन में सही, देवनागरी में गलत
ज्यादातर जगहों पर रोमन लिपि में नाम सही लिखे गए हैं।
इन नामों को देवनागरी में लिखते समय NHAI के राजभाषा विभाग के अधिकारियों ने स्थानीय संदर्भों को ठीक तरह से देखने की आवश्यकता नहीं समझी।
इसी का परिणाम है कि जमालपुर कलां को ‘जमालपुर कलान’ और जिया पोता को ‘जिया पोटा’ लिखकर नया नाम दे दिया गया।
स्थानीय प्रशासन से प्रमाणित सूची लेना जरूरी
ये गलतियां केवल उस रास्ते की हैं, जहां से मैं रोज गुजरता हूं।
आप जिन राजमार्गों के आसपास रहते हैं या जिनसे आते-जाते हैं, वहां भी ऐसी ही गलतियों का अंबार मिल सकता है।
हालांकि, देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेसवे पर ऐसी गलतियां बहुत कम हैं।
इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि NHAI के अधिकारियों को स्थानीय प्रशासन
और राजस्व विभाग से प्रमाणित स्थान-नामों की सूची लेकर ही नामपट्ट तैयार करने चाहिए थे।
ऐसा लगता है कि यह आवश्यक प्रक्रिया अपनाई ही नहीं गई।
AI के इस्तेमाल में मानवीय जांच जरूरी
यदि वास्तव में AI या मशीन अनुवाद का उपयोग किया गया है,
तो अंतिम स्वीकृति मानव विशेषज्ञ द्वारा होनी चाहिए थी।
तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन स्थानीय ज्ञान का स्थान नहीं ले सकती।
NHAI को कराना चाहिए भाषाई ऑडिट
NHAI को एक राज्यव्यापी या राष्ट्रीय स्तर का ऑडिट कराकर सभी संकेतकों की भाषाई शुद्धता की जांच करानी चाहिए।
जहां भी त्रुटियां हों, उन्हें प्राथमिकता से सुधारा जाना चाहिए।
स्थानीय विशेषज्ञों, भाषाविदों या राज्य के भाषा विभाग की सहायता लेकर ऐसी गलतियों से आसानी से बचा जा सकता है।
सड़कें महज एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं ले जातीं। वे उस क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और पहचान से भी परिचय कराती हैं।
यदि उन पर लिखे नाम ही गलत हों, तो बाहर से आने वाले लोग उस क्षेत्र की वास्तविक पहचान को लेकर भ्रमित होंगे ही।

















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