देश में सरकारी नौकरियों के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है
कि यदि किसी पद के लिए अधिकतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की गई है, तो उससे अधिक योग्यता रखने वाले उम्मीदवार को भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि किसी पद के लिए अधिकतम
शैक्षणिक योग्यता तय करना और उससे अधिक योग्यता वाले उम्मीदवारों को बाहर रखना पूरी तरह उचित और न्यायसंगत है।
अदालत ने कहा कि सरकार का उद्देश्य ऐसे लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना भी है, जो विभिन्न परिस्थितियों के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके।
रोजगार के अवसरों की समानता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कुछ पदों को कम शैक्षणिक योग्यता वाले
उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रख सकता है। यदि अधिक योग्यता वाले उम्मीदवारों को ऐसे पदों पर नियुक्ति की अनुमति दी
जाती है, तो इससे वास्तविक पात्र और जरूरतमंद अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित होंगे।
अदालत ने कहा कि नियोक्ता की आवश्यकता हमेशा अधिक योग्य व्यक्ति नहीं होती, बल्कि सही पद के लिए सही उम्मीदवार
का चयन करना अधिक महत्वपूर्ण है।
बैंक कर्मचारी की बर्खास्तगी को ठहराया सही
यह टिप्पणी अदालत ने एक बैंक कर्मचारी की सेवा समाप्ति को सही ठहराते हुए की। संबंधित कर्मचारी ने नौकरी के लिए
आवेदन करते समय अपनी वास्तविक शैक्षणिक योग्यता छिपाई थी। पद के लिए शर्त थी कि उम्मीदवार आठवीं पास हो,
लेकिन बारहवीं पास या उससे अधिक शिक्षित न हो।
जांच में सामने आया कि कर्मचारी नियुक्ति के समय स्नातक (Graduate) था।
इसके बाद बैंक ने उसकी सेवा समाप्त कर दी थी। मामले को चुनौती दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के फैसले को सही माना।
अदालत ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यद्यपि मामले में संबंधित कर्मचारी के प्रति सहानुभूति हो सकती है,
लेकिन उसके आचरण और कानून की स्थापित स्थिति को देखते हुए अदालत के पास हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित पात्रता शर्तों का पालन सभी उम्मीदवारों के लिए अनिवार्य है और अधिक योग्यता होना हमेशा चयन का आधार नहीं बन सकता।
















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