देवी-देवताओं की महिमा से भक्तिमय होता है पूरा क्षेत्र
राकेश्वरी मंदिर में सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन, लोकसंस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को संजो रहा आयोजन
ऊखीमठ विकासखंड की मद्महेश्वर घाटी स्थित रासी गांव इन दिनों पौराणिक जागरों की दिव्य स्वर-लहरियों से गुंजायमान है।
भगवती राकेश्वरी मंदिर में आयोजित यह पारंपरिक धार्मिक आयोजन उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था
और आध्यात्मिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण बन गया है।
प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु जागरों में शामिल होकर देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।
हरिद्वार से चौखम्भा हिमालय तक देवी-देवताओं का गुणगान
लोक परंपरा के अनुसार आयोजित इन पौराणिक जागरों में हरि के द्वार हरिद्वार से लेकर चौखम्भा हिमालय तक
विराजमान देवी-देवताओं, सिद्धों, ऋषि-मुनियों, लोकदेवताओं और शक्तिपीठों की महिमा का भावपूर्ण गायन किया जाता है।
पारंपरिक ढोल-दमाऊं और अन्य लोक वाद्यों की मधुर थाप पर जागर गायक देवी-देवताओं का आवाहन, उनकी लीलाओं,
तप, त्याग और लोककल्याण की गाथाओं का वर्णन करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
दो माह तक चलता है धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन
राकेश्वरी मंदिर समिति के कार्यकारी अध्यक्ष मदन भट्ट ने बताया कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी है।
लगभग दो माह तक चलने वाले इन जागरों में प्रतिदिन आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
लोकगाथाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, इतिहास और लोक परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी यह आयोजन करता है।

लोकदेवताओं की महिमा का होता है विस्तृत वर्णन
मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने बताया कि जागर गायन के दौरान भगवान बदरी-विशाल, केदारनाथ,
पंचकेदार, चौखम्भा हिमालय, मां नंदा, राजराजेश्वरी, क्षेत्रपाल, भैरव, नागराजा सहित अनेक लोकदेवताओं की महिमा का विस्तार से वर्णन किया जाता है।
श्रद्धालु इसे देवी-देवताओं से आध्यात्मिक संवाद का माध्यम मानते हैं।
ब्रह्मकमल अर्पित कर होता है जागरों का समापन
शिक्षाविद रविन्द्र भट्ट के अनुसार, युगों से चली आ रही परंपरा के तहत आश्विन मास की द्वितीया तिथि पर हिमालय से लाए गए पवित्र ब्रह्मकमल भगवती राकेश्वरी को अर्पित किए जाते हैं।
इसी विशेष पूजा-अर्चना के साथ दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरों का विधिवत समापन होता है।
इस अवसर पर हवन, विशेष पूजा, आरती और प्रसाद वितरण का आयोजन भी किया जाता है।
लोकसंस्कृति संरक्षण का सशक्त माध्यम बने पौराणिक जागर
मुख्य जागरी पूर्ण सिंह पंवार का कहना है कि रासी गांव की यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है।
उनका मानना है कि पौराणिक जागर केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और आध्यात्मिक धरोहर के संरक्षण का प्रभावी माध्यम हैं।
यही कारण है कि हर वर्ष इस आयोजन में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है और रासी गांव देवभक्ति, लोकआस्था और सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।














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