उत्तराखंड परिवहन निगम की संविदा परिचालक की बर्खास्तगी रद्द, सेवा बहाली के आदेश
संविदा कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने
एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है।
न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकलपीठ ने उत्तराखंड परिवहन निगम में संविदा परिचालक
के पद पर कार्यरत गंगा जोशी की बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी संविदा कर्मचारी को कदाचार के आधार पर हटाया जाता है,
तो बिना विभागीय जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए ऐसा करना संविधान के विरुद्ध है।
1998 में हुई थी संविदा नियुक्ति
याचिकाकर्ता गंगा जोशी की नियुक्ति वर्ष 1998 में परिवहन निगम में संविदा परिचालक के रूप में हुई थी।
निगम के अनुसार मार्च 2011 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने टिकट मशीन में कथित हेराफेरी
करते हुए 1062 ‘जीरो बैलेंस’ टिकट जारी किए, जिससे निगम को 45,407 रुपये का नुकसान हुआ।
इन आरोपों के आधार पर सहायक महाप्रबंधक, काठगोदाम द्वारा 26 मार्च 2011
को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं और जमानत राशि सहित देयकों को भी जब्त कर लिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से रखी गई दलीलें
गंगा जोशी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.सी. कांडपाल ने
अदालत को बताया कि उन्हें टिकट मशीन संचालन का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।
मशीन में तकनीकी खराबी या अनजाने में बटन दबने के कारण ‘जीरो टिकट’ निकलना संभव था।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बर्खास्तगी आदेश कलंककारी है, क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बिना किसी जांच और सुनवाई के सेवा समाप्त करना कानून के विरुद्ध है।
निगम का पक्ष
परिवहन निगम की ओर से दलील दी गई कि गंगा जोशी पूर्व में भी बिना टिकट यात्रियों
को ले जाने के मामलों में दोषी पाई गई थीं।
निगम का कहना था कि संविदा कर्मचारी होने के कारण उन पर
नियमित अनुशासनात्मक नियम लागू नहीं होते और भ्रष्टाचार के मामलों में विश्वास समाप्त होने पर सेवा समाप्ति उचित है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों, विशेष रूप से पुरुषोत्तम लाल ढींगरा मामला का
हवाला देते हुए कहा कि संविदा कर्मचारी भी तब संवैधानिक संरक्षण के दायरे में आता है, जब बर्खास्तगी का आधार कदाचार हो और आदेश से उसके भविष्य के करियर पर दुष्प्रभाव पड़ता हो।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 311 की भावना के अनुरूप निष्पक्ष जांच अनिवार्य है।
सेवा बहाली और एरियर का आदेश
कोर्ट ने वर्ष 2011 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए गंगा जोशी को सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही, पिछले वर्षों के वेतन का 50 प्रतिशत एरियर देने का भी आदेश दिया गया है।
हालांकि, अदालत ने निगम को यह स्वतंत्रता दी है कि वे विधि सम्मत प्रक्रिया अपनाते हुए दोबारा जांच कर नया आदेश पारित कर सकते हैं।
नियमितीकरण की मांग खारिज
याचिकाकर्ता द्वारा लिपिक पद पर नियमितीकरण की मांग को कोर्ट ने खारिज कर दिया,
यह कहते हुए कि उनकी मूल नियुक्ति परिचालक के पद पर थी और उसी के आधार पर उनके अधिकारों का मूल्यांकन किया जाएगा।
















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