‘न्यायपालिका की छवि खराब करने’ के आरोप में विवादित अंश हटाने की मांग
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद)
यानी NCERT की कक्षा 8 की पुरानी सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को लेकर
सुप्रीम कोर्ट में एक नई कानूनी चुनौती सामने आई है।
NCERT के पूर्व सदस्य डॉ. पंकज पुष्कर ने शीर्ष अदालत में रिट याचिका दायर कर
वर्ष 2015-16 संस्करण की पुस्तक ‘सामाजिक और राजनीतिक जीवन–III’
के एक अंश को असंवैधानिक और न्यायपालिका की गरिमा के प्रतिकूल बताया है।
याचिका भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 और 129 के तहत Supreme Court of India में दाखिल की गई है।
यह कदम हाल ही में कक्षा 8 की एक अन्य पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार”
शीर्षक अंश पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेने के बाद उठाया गया है।
क्या है पूरा विवाद
याचिका में विशेष रूप से वर्ष 2015-16 के संस्करण की सामाजिक विज्ञान पुस्तक
‘सामाजिक और राजनीतिक जीवन–III’ के पृष्ठ संख्या 62 पर दिए गए एक अंश पर आपत्ति जताई गई है।
इस अंश में न्यायपालिका की भूमिका और आजीविका के अधिकार (Right to Livelihood) पर चर्चा की गई है।
याचिकाकर्ता का दावा है कि पुस्तक में प्रस्तुत भाषा और संदर्भ न्यायिक
निर्णयों को उनके संवैधानिक, वैधानिक और तथ्यात्मक परिप्रेक्ष्य से अलग करके दिखाते हैं, जिससे छात्रों के मन में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को लेकर भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क
1. भ्रामक चित्रण का आरोप
याचिका के अनुसार, प्रारंभिक शिक्षा स्तर पर इस प्रकार की सामग्री छात्रों के मन में न्यायपालिका की गलत छवि बना सकती है। इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अदालतों को अक्सर सार्वजनिक हित और वैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
2. संस्थागत विश्वास में कमी
याचिका में कहा गया है कि बिना पर्याप्त संदर्भ के ऐसे अंश राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करना संस्थागत विश्वास को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि ऐसी सामग्री ‘आपराधिक अवमानना’ की श्रेणी में आ सकती है, क्योंकि यह न्यायिक अधिकार को कमजोर करती है।
3. विशेषज्ञता का हवाला
डॉ. पंकज पुष्कर ने उल्लेख किया है कि वे स्वयं NCERT में ‘सीनियर एसोसिएट फेलो (शिक्षाशास्त्र)’ के रूप में कार्य कर चुके हैं। इसलिए उन्हें पाठ्यपुस्तक निर्माण, समीक्षा और अनुमोदन प्रक्रियाओं की जानकारी है।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कार्रवाई का संदर्भ
हाल ही में Supreme Court of India ने कक्षा 8 की एक अन्य पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” शीर्षक अंश पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया था। अदालत ने उस सामग्री को “अवमाननाजनक” मानते हुए उसके प्रसार पर रोक लगा दी थी।
वर्तमान याचिका उसी संदर्भ में न्यायपालिका की गरिमा और शैक्षणिक सामग्री की संवैधानिकता पर व्यापक प्रश्न उठाती है।
याचिका में की गई प्रमुख मांगें
- विवादित सामग्री की संवैधानिक और शैक्षणिक औचित्य की जांच कराई जाए।
- केंद्र सरकार और NCERT को अध्याय के प्रारूपण, समीक्षा और अनुमोदन से जुड़े रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया जाए।
- न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करने वाली सामग्री को तुरंत हटाने या संशोधित करने का आदेश दिया जाए।
- अनुच्छेद 129 के तहत ऐसे प्रकाशनों पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया जाए जो न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करते हों।
- भविष्य में शैक्षणिक सामग्री की समीक्षा के लिए एक संवैधानिक रूप से अनुपालन तंत्र (Review Mechanism) स्थापित किया जाए।
व्यापक असर: शिक्षा बनाम संस्थागत गरिमा
यह मामला केवल एक पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न उठाता है
कि शैक्षणिक सामग्री में न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं का
चित्रण किस सीमा तक और किस भाषा में किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा में आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करना आवश्यक है,
लेकिन साथ ही संस्थागत सम्मान और संवैधानिक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अब यह देखना अहम होगा कि Supreme Court of India इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है
और क्या यह मामला राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव का कारण बनता है।
















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