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गगनयान मिशन: अब अंतरिक्ष में जाएंगे सिविलियन भी

ISRO बना रहा 40 एस्ट्रोनॉट्स का बड़ा प्लान

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपने महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी में है।

अब केवल वायुसेना के टेस्ट पायलट ही नहीं, बल्कि आम नागरिक यानी

सिविलियन एस्ट्रोनॉट्स को भी अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बनाया जाएगा।

इसके लिए इसरो ने दूसरे और तीसरे बैच की तैयारी का विस्तृत खाका तैयार किया है।

एक एस्ट्रोनॉट को तैयार करने में लगते हैं 54 महीने

किसी भी एस्ट्रोनॉट का चयन, प्रशिक्षण और मिशन के लिए पूरी तैयारी में लगभग साढ़े 4 साल यानी 54 महीने का समय लगता है।

समिति ने तय किया है कि दूसरा बैच अगले 72 महीनों में

और तीसरा बैच 96 महीनों में पूरी तरह तैयार कर लिया जाएगा।

चौथे गगनयान मिशन से शुरू होगी सिविलियन उड़ान

हालांकि दूसरे बैच में सिविलियन उम्मीदवारों को शामिल किया जाएगा, लेकिन उन्हें तुरंत अंतरिक्ष यात्रा का मौका नहीं मिलेगा।

योजना के अनुसार, चौथे मानव मिशन से नागरिक एस्ट्रोनॉट्स को चालक दल में शामिल किया जाएगा।

दुनिया भर में पहले तकनीकी रूप से अनुभवी सैन्य पायलटों को अंतरिक्ष मिशनों में भेजने की परंपरा रही है।

जब तकनीक पूरी तरह सुरक्षित और परिपक्व हो जाती है, तब नागरिक विशेषज्ञों को अवसर दिया जाता है।

पहले बैच में शामिल हैं 4 एस्ट्रोनॉट्स

गगनयान मिशन ISRO का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है, जिसे 2027 तक लॉन्च करने का लक्ष्य है।

यह 3 दिन का मिशन होगा, जिसमें 3 एस्ट्रोनॉट्स को 400 किलोमीटर की ऊंचाई तक भेजा जाएगा

और सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाया जाएगा।

पहले बैच में भारतीय वायुसेना के चार टेस्ट पायलट शामिल किए गए हैं-

  • एयर कमांडर प्रशांत बी. नायर
  • ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला
  • ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन
  • ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप

इनका चयन पहले मिशन की सुरक्षा और सफलता को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

दूसरे बैच में आर्मी पायलट भी हो सकते हैं शामिल

दूसरे बैच में इंडियन आर्मी के फाइटर जेट और लड़ाकू हेलीकॉप्टर पायलटों को भी शामिल किए जाने की संभावना है।

इससे मिशन में विविध अनुभव और तकनीकी दक्षता बढ़ेगी।

तीसरे बैच में 10 सिविलियन स्पेशलिस्ट होंगे

सातवें मिशन के बाद ISRO अपनी क्षमता बढ़ाएगा, जिससे एक साथ 3 एस्ट्रोनॉट्स को अंतरिक्ष में भेजा जा सकेगा।

इसके लिए तीसरे बैच में कुल 12 एस्ट्रोनॉट्स की जरूरत होगी।

इस बैच में केवल 2 मिशन पायलट होंगे, जबकि 10 सदस्य सिविलियन स्पेशलिस्ट होंगे।

यह बदलाव भारत के भविष्य के स्पेस स्टेशन मिशनों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।

साल में दो मिशन, 40 एस्ट्रोनॉट्स का लक्ष्य

ISRO अब एक स्थायी एस्ट्रोनॉट कैडर बनाने की दिशा में काम कर रहा है। योजना है कि हर साल दो मानव मिशन भेजे जाएं।

इसके लिए कुल 40 एस्ट्रोनॉट्स का एक मजबूत पूल तैयार किया जाएगा, ताकि भारत भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्पेस मिशनों में भी बड़ी भूमिका निभा सके।

इंफ्रास्ट्रक्चर और लाइफ सपोर्ट सिस्टम सबसे बड़ी चुनौती

इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने कई तकनीकी चुनौतियां भी हैं।

फिलहाल देश में केवल एक अस्थायी एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग सेंटर है, जबकि स्थायी ट्रेनिंग सुविधा अभी निर्माण प्रक्रिया में भी नहीं पहुंची है।

इसके अलावा ‘पर्यावरण नियंत्रण और जीवन रक्षक प्रणाली’ (ECLSS) जैसी अहम तकनीक का विकास भी अभी धीमा है।

यह सिस्टम अंतरिक्ष में मानव जीवन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।

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