गजेंद्र रावत (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
जिलाधिकारी के आदेश के 09 माह बाद भी बुजुर्ग महिला को नहीं मिला घर का कब्जा
Dehradun के पूर्व जिलाधिकारी Savin Bansal को लेकर सोशल मीडिया पर बनाई गई छवि
और जमीनी हकीकत को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं।
एडवोकेट Prem Chand Sharma ने आरोप लगाया है कि डीएम के आदेशों का प्रचार तो खूब हुआ,
लेकिन धरातल पर पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया।
एडवोकेट प्रेमचंद शर्मा ने उठाए गंभीर सवाल
एडवोकेट Prem Chand Sharma का कहना है कि उन्होंने पूर्व डीएम सविन बंसल के खिलाफ गंभीर शिकायतें उठाईं,
लेकिन उन आरोपों का कभी स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर डीएम के समर्थन में बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया और “आई एम विद सविन बंसल” जैसे स्लोगन तक प्रचारित किए गए।
हालांकि, अंततः प्रशासनिक फेरबदल में Savin Bansal को देहरादून डीएम पद से हटना पड़ा।

“रॉबिन हुड” छवि पर सवाल
लेख में दावा किया गया है कि जिलाधिकारी के तौर पर कुछ मामलों में त्वरित फैसलों को सोशल मीडिया
और मीडिया में प्रमुखता से दिखाया गया, लेकिन बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित रहीं।
एडवोकेट का कहना है कि एक आईएएस अधिकारी को केवल कुछ मामलों के समाधान के आधार पर
“रॉबिन हुड” जैसी छवि देना उचित नहीं हो सकता, जबकि कई फरियादी अब भी न्याय के लिए भटक रहे हैं।

बुजुर्ग महिला के मामले का जिक्र
इस पूरे विवाद में 72 वर्षीय Urmila Raghav का मामला भी सामने आया है।
आरोप है कि उनके बेटे ने मकान पर कब्जा कर उन्हें घर से बाहर कर दिया था।
बताया गया कि मामला जनता दरबार के माध्यम से डीएम कार्यालय तक पहुंचा।
इसके बाद 27 अगस्त 2025 को Savin Bansal के हस्ताक्षर से आदेश जारी हुआ,
जिसमें कहा गया कि जब खतौनी में किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज है तो कोई तीसरा व्यक्ति जबरन कब्जा कैसे कर सकता है और उसे हटाया जाए।
आदेश के बावजूद नहीं मिला कब्जा
लेख के अनुसार आदेश जारी होने के कई महीने बाद भी बुजुर्ग महिला को अपने घर का कब्जा नहीं मिल पाया।
आरोप है कि बरसात, सर्दी और गर्मी बीत गई, लेकिन आदेश का प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दिया।
इस मामले को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या प्रशासनिक आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गए।
नए जिलाधिकारी से उम्मीद
लेख में उम्मीद जताई गई है कि नए जिलाधिकारी ऐसे मामलों से सबक लेकर जमीनी स्तर पर कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।
साथ ही यह भी कहा गया है कि अधिकारियों की वास्तविक कार्यशैली का मूल्यांकन केवल सोशल मीडिया प्रचार से नहीं,
बल्कि आम लोगों को मिले न्याय से होना चाहिए।
यह लेखक की निजी राय है

















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