बदहाल सड़क-पार्किंग और पड़ाव को लेकर उठे सवाल
मां नंदा की बड़ी जात में आस्था का सैलाब उमड़ रहा है। कुरुड़ में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने से पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आ रहा है।
12 साल बाद आयोजित हो रही इस बड़ी जात में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।
यात्रा में ढोल-दमाऊं और मां नंदा के जयकारों से माहौल भक्तिमय बना हुआ है।
मां नंदा की बड़ी जात केवल धार्मिक यात्रा नहीं है। यह उत्तराखंड की लोक आस्था, परंपरा और पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ी यात्रा है।
बदहाल सड़क और पार्किंग व्यवस्था बनी चुनौती
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच यात्रा मार्ग की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
नंदप्रयाग से कुरुड़ तक सड़क की स्थिति को लेकर लोगों ने परेशानी बताई।
कुरुड़ में श्रद्धालुओं की संख्या इतनी अधिक रही कि कई स्थानों पर वाहनों को खड़ा करने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिली। इससे स्थानीय लोगों और यात्रियों को दिक्कत हुई।
नंदा जात समिति के अध्यक्ष कर्नल हरेंद्र सिंह रावत का कहना है कि यह यात्रा पारंपरिक रूप से एक गांव से दूसरे गांव तक पैदल होती है।
उन्होंने कहा कि इसलिए पूरी यात्रा के लिए सड़क को मुख्य आधार मानना उचित नहीं है।
हालांकि, यात्रा मार्ग पर बुनियादी सुविधाओं की जरूरत से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
कर्नल रावत के अनुसार नंदप्रयाग से सुतोल तक करीब 11 नए पुल बनाए जा चुके हैं।
उन्होंने बताया कि सड़क निर्माण का काम भी प्रगति पर है।
उनका कहना है कि कुरुड़ में जिस तरह हजारों श्रद्धालु पहुंचे, उससे मां नंदा के प्रति लोगों की आस्था साफ दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के बाद उनकी भावनाओं और सुविधाओं का ध्यान रखना सरकारों की जिम्मेदारी है।
आगे बढ़ रही मां नंदा की यात्रा
कुरुड़ से शुरू हुई बड़ी जात अब अपने निर्धारित पड़ावों की ओर बढ़ रही है। 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से यात्रा चरबंग के लिए रवाना हुई।
6 सितंबर को यात्रा चरबंग से कुंडबगड़ होते हुए मथकोट पहुंचने का कार्यक्रम है।
इसके बाद 7 सितंबर को यात्रा मथकोट से धरगांव, नंदानगर होते हुए उस्तोली पहुंचेगी।
इसके बाद 8 सितंबर को यात्रा उस्तोली से सरपाणी और लांखी होते हुए भेंटी पहुंचेगी। 9 सितंबर को भेंटी से स्यांरी बंगाली होते हुए डुंग्री का पड़ाव निर्धारित है।
10 सितंबर को यात्रा डुंग्री से केरा और मैन होते हुए सूना पहुंचेगी।
11 सितंबर को सूना से थराली और राड़ीबगड़ होते हुए चेपड़ों पहुंचने का कार्यक्रम है।
12 सितंबर को चेपड़ों से कोठी होते हुए यात्रा नंदकेसरी पहुंचेगी।
यहां विभिन्न क्षेत्रों से आने वाली देवी डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा।
इसके बाद यात्रा आगे बढ़ते हुए वाण पहुंचेगी। यहां लाटू देवता की पूजा-अर्चना के बाद बड़ी जात उच्च हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़ेगी।
यात्रा का कठिन चरण रणकधार, गैरोली पातल, वेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां और कैलवा विनायक होते हुए आगे बढ़ेगा।
इसके बाद यात्रा रूपकुंड और ज्यूरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेगी। यहां से पंचगंगा होते हुए होमकुंड पहुंचने का कार्यक्रम है।
होमकुंड में मां नंदा की पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान के बाद यात्रा वापसी के पड़ावों की ओर बढ़ेगी।
पड़ाव को लेकर भी उठे सवाल
आस्था की इस यात्रा के बीच पड़ाव को लेकर विवाद भी सामने आया है।
नंदानगर क्षेत्र के लोगों ने यात्रा के कार्यक्रम और पड़ाव में बदलाव को लेकर आपत्ति जताई है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि पहले राजजात के कार्यक्रम और पड़ाव पंचांग में निर्धारित किए गए थे।
उनके मुताबिक उस समय कुंड के सिद्धपीठ होने का उल्लेख नहीं था।
ग्रामीणों का आरोप है कि बाद में पंचांग में निर्धारित कार्यक्रम में बदलाव किया गया। इसके बाद जात के पड़ाव को भी टाल दिया गया।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यात्रा को लेकर पहले से तैयारियां की जा रही थीं।
पड़ाव में बदलाव से उनकी तैयारियों और भावनाओं पर असर पड़ा है।
इस मामले को लेकर ग्रामीणों की बैठक भी हुई। बैठक में क्षेत्रवासियों ने अपनी आपत्तियां और मांगें सामने रखीं।
अब आगे की व्यवस्था और यात्रा के पड़ाव को लेकर समिति के स्तर पर निर्णय लिए जाने की बात कही जा रही है।
आस्था बड़ी, व्यवस्थाएं कितनी तैयार?
नंदा की बड़ी जात में उमड़ रही भीड़ ने एक बार फिर पहाड़ की गहरी धार्मिक आस्था को सामने रखा है।
हजारों श्रद्धालु कठिन रास्तों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों की परवाह किए बिना यात्रा में शामिल हो रहे हैं।
लेकिन इतनी बड़ी धार्मिक यात्रा के बीच सड़क, पार्किंग और अन्य सुविधाओं को लेकर उठ रहे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।
सरकार और संबंधित समितियां व्यवस्थाएं पूरी होने की बात कह रही हैं। वहीं जमीन पर श्रद्धालुओं की भीड़ कई व्यवस्थाओं की परीक्षा ले रही है।
नंदा की बड़ी जात ने फिर दिखाया है कि पहाड़ की कठिन राहें आस्था को नहीं रोक सकतीं।
अब सवाल यही है कि क्या व्यवस्थाएं भी इस आस्था के साथ कदम मिला पाएंगी?















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