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सरोकारों से साक्षात्कार

पांच भाषाओं में ‘पंचवेणी कोश’ का लोकार्पण

संस्कृति संरक्षण और आदर्श आचरण पर हुआ मंथन

गंगा असनोड़ा

हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद की ओर से आयोजित भव्य कार्यक्रम में डॉ. प्रकाश चमोली द्वारा रचित पुस्तक ‘पंचवेणी कोश’ का लोकार्पण किया गया।

पुस्तक को गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं के समन्वय का महत्वपूर्ण प्रयास बताते हुए

वक्ताओं ने इसे भाषा, साहित्य और संस्कृति को जोड़ने वाली कृति बताया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग के परिसर निदेशक डॉ. बी.बी. सुब्रमण्यम रहे।

अध्यक्षता प्रो. उमा मैठाणी ने की।

विशिष्ट अतिथि के रूप में रुद्रप्रयाग जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम कठैत तथा लोक कला संस्कृति एवं निष्पादन केंद्र, चौरास परिसर के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ मौजूद रहे।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विष्णुदत्त कुकरेती ने ‘पंचवेणी’ को विभिन्न भाषाओं और विचारों के समन्वय का प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा कि पुस्तक का नाम ही इसकी अवधारणा को स्पष्ट करता है।

एक मूल भाव को अलग-अलग भाषाओं और रूपों में अभिव्यक्त करने का प्रयास भारतीय परंपरा की विविधता में एकता की भावना को सामने लाता है।

उन्होंने ‘पंचवेणी’ को शिव-शक्ति के समन्वय का प्रतीक बताते हुए लेखक और आयोजकों को बधाई दी।

वक्ताओं ने पुस्तक में पांच भाषाओं के प्रयोग को इसकी विशेष उपलब्धि बताया।

उन्होंने कहा कि एक भाषा के भाव, मुहावरों और स्थानीय संदर्भ को दूसरी भाषा में उसी अर्थ और संवेदना के साथ प्रस्तुत करना आसान नहीं होता।

ऐसे में ‘पंचवेणी कोश’ का बहुभाषी स्वरूप लेखक के श्रम और भाषाई समझ को दर्शाता है।

मुख्य अतिथि डॉ. बी.बी. सुब्रमण्यम ने भारतीय संस्कृति की विशेषता बताते हुए कहा कि

देश की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों ने सदैव एक-दूसरे को जोड़ने का काम किया है।

उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया के दौर में पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति में कमी आई है,

ऐसे समय में पुस्तक का लेखन स्वयं में प्रेरणादायी कार्य है।

किताबें मनुष्य की अच्छी मित्र होती हैं और जीवन की दुविधाओं में मार्गदर्शन देती हैं।

पुस्तक के लेखक डॉ. प्रकाश चमोली ने कहा कि भारतीय संस्कृति और विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी किसी एक संस्था की नहीं,

बल्कि प्रत्येक नागरिक की है। उन्होंने कहा कि कोई लेखनी से, कोई वाणी से,

कोई कर्म से और कोई अपने आदर्श जीवन के माध्यम से संस्कृति की रक्षा में योगदान दे सकता है।

उन्होंने कहा कि संस्कृति की बात करने से पहले यह देखना होगा कि हम स्वयं अपनी भाषा, परंपराओं और जीवन-मूल्यों से कितने जुड़े हैं।

गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं में तैयार इस कृति को वक्ताओं ने भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

कार्यक्रम में संस्कृति, लोकभाषाओं और आदर्श आचरण को लेकर विचार-विमर्श हुआ।

प्रमुख अतिथि और अध्यक्षता

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग के परिसर निदेशक डॉ. बी.बी. सुब्रमण्यम रहे।

अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विष्णु दत्त कुकरेती ने की।

विशिष्ट अतिथि के रूप में लोक कला संस्कृति एवं निष्पादन केंद्र, चौरास परिसर के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ मौजूद रहे।

कार्यक्रम में पुस्तक तैयार करने में सहयोग देने वाले विशेषज्ञों सहित साहित्यकार, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता मंचासीन रहे।

बहुभाषी कृति का लोकार्पण

वक्ताओं ने कहा कि एक भाषा के भाव, मुहावरों और स्थानीय संदर्भ को दूसरी भाषा में उसी अर्थ और संवेदना के साथ प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण कार्य है।

ऐसे में ‘पंचवेणी कोश’ का गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत में तैयार होना लेखक के श्रम, भाषाई समझ और शोध का परिचायक है।

विष्णु दत्त कुकरेती ने कहा—समन्वय का प्रतीक है ‘पंचवेणी

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. विष्णुनाथ कुकरेती ने ‘पंचवेणी’ को विभिन्न भाषाओं और विचारों के समन्वय का प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा कि पुस्तक का नाम ही इसकी अवधारणा को स्पष्ट करता है।

एक मूल भाव को अलग-अलग भाषाओं और रूपों में अभिव्यक्त करने का यह प्रयास भारतीय परंपरा की विविधता में एकता की भावना को सामने लाता है।

उन्होंने ‘पंचवेणी’ को शिव-शक्ति के समन्वय का प्रतीक बताते हुए लेखक और आयोजकों को बधाई दी।

डॉ. बी.बी. सुब्रमण्यम ने पुस्तकों को बताया अच्छी मित्र

मुख्य अतिथि डॉ. बी.बी. सुब्रमण्यम ने कहा कि भारतीय संस्कृति की विशेषता विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों को जोड़ने में रही है।

सोशल मीडिया के दौर में पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति में कमी आई है, ऐसे समय में पुस्तक लेखन प्रेरणादायी कार्य है।

उन्होंने कहा कि किताबें मनुष्य की अच्छी मित्र होती हैं और जीवन की दुविधाओं में मार्गदर्शन देती हैं।

लेखक डॉ. प्रकाश चमोली ने संस्कृति संरक्षण पर दिया जोर

लेखक डॉ. प्रकाश चमोली ने कहा कि भारतीय संस्कृति और विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की है।

कोई लेखनी से, कोई वाणी से, कोई कर्म से और कोई अपने आदर्श जीवन के माध्यम से संस्कृति की रक्षा में योगदान दे सकता है।

उन्होंने कहा कि संस्कृति की बात करने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि वह स्वयं अपनी भाषा, परंपराओं और जीवन-मूल्यों से कितना जुड़ा है।

कार्यक्रम में इनकी रही भूमिका

कार्यक्रम में राजकीय शिक्षक संघ के पूर्व मंडलीय मंत्री शिव सिंह नेगी ने पुस्तक की विवेचना की। डॉ. विमला चमोला और जय कृष्ण पैन्यूली ने पुस्तक के आमुख के संदर्भ में विचार रखे। कृष्णानंद मैठाणी ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि राजेंद्र प्रसाद कपरुवाण ने धन्यवाद ज्ञापित किया। मंच संचालन नीरज नैथानी ने किया।

पुस्तक की खासियत

  • ‘पंचवेणी कोश’ पांच भाषाओं—गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत—का समन्वित प्रयास है।
  • पुस्तक में भाषाई विविधता के साथ लोकभाषाओं, मुहावरों और सांस्कृतिक संदर्भों को महत्व दिया गया है।
  • कृति भाषा, साहित्य और संस्कृति को जोड़ने का माध्यम बनने का प्रयास करती है।

वक्ताओं के प्रमुख संदेश

  • संस्कृति संरक्षण की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है।
  • आदर्श व्यक्तित्व पद से नहीं, आचरण से बनता है।
  • शिक्षक, अभिभावक और समाज के जिम्मेदार लोगों का व्यवहार नई पीढ़ी को प्रभावित करता है।
  • पुस्तकों और लोकभाषाओं को बचाना सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।

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