अमन दास
न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक माना जाता है। ऐसे में यह उम्मीद की जाती है कि संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन उसके भीतर स्वयं कभी नहीं होगा। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
25 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दो हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल मनुभाई पंचोली को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की सिफारिश की थी। और 29 अगस्त 2025 को दोनों न्यायमूर्तियों ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ भी ले ली।
लेकिन 26 अगस्त 2025 को वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंग ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की इस सिफारिश पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिरकार तीन महिला न्यायाधीश, जो न्यायमूर्ति पंचोली से वरिष्ठ हैं, उन्हें क्यों नज़रअंदाज़ किया गया? यह सवाल कॉलेजियम की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर गंभीर संदेह खड़ा करता है।
यह भी सामने आया है कि कॉलेजियम की बैठक में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने इस सिफारिश पर एकमात्र असहमति जताई। पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, न्यायमूर्ति अभय ओका ने भी महिला न्यायमूर्ति की इस “एकाकी असहमति” पर चिंता व्यक्त की है। आज तक सुप्रीम कोर्ट में कुल 279 न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई है, जिनमें से केवल 11 महिला न्यायाधीश रही हैं, यानी कुल संख्या का लगभग 4%।
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में केवल एक ही महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं। यह अंतराल बड़ा है, लेकिन इसका कोई स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आता। वरिष्ठ अधिवक्ता जयसिंग ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के चयन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। आज तक कोई भी महिला न्यायाधीश भारत की मुख्य न्यायाधीश नहीं बनी है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना इस पद पर पहुँचने वाली पहली महिला बनने जा रही हैं, लेकिन उनकी कार्यावधि केवल 36 दिनों की होगी। जयसिंग का यह सवाल हमें सोचने पर मजबूर करता है, क्या न्यायपालिका वास्तव में पक्षपात से मुक्त है? क्या उस इमारत के भीतर लैंगिक समानता है, जिसे न्याय का मंदिर कहा जाता है?
इसका उत्तर अभी सामने आना बाकी है क्योंकि कॉलेजियम की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
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