वाडिया इंस्टीट्यूट की रिसर्च ने खोले नए राज, भूकंप की सटीक भविष्यवाणी अब भी चुनौती
दुनिया में फिलहाल ऐसा कोई वैज्ञानिक सिस्टम मौजूद नहीं है जो यह सटीक बता सके कि भूकंप कब, कहां और कितनी तीव्रता का आएगा।
हालांकि वैज्ञानिक लगातार ऐसे संकेतों की तलाश में जुटे हैं, जिनकी मदद से भूकंप का पूर्वानुमान लगाया जा सके। इन्हीं संकेतों में रेडॉन गैस को सबसे अहम माना जा रहा है।
उत्तराखंड स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की नई रिसर्च ने इस दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। अध्ययन में सामने आया कि वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान भी रेडॉन गैस के स्तर में असामान्य बदलाव दर्ज किया गया था।
क्या है रेडॉन गैस
रेडॉन एक रंगहीन, गंधहीन और रेडियोधर्मी गैस है।
यह मिट्टी और चट्टानों में मौजूद यूरेनियम और थोरियम के प्राकृतिक क्षय से बनती है।
कई अध्ययनों में पाया गया है कि भूकंप आने से पहले किसी क्षेत्र में रेडॉन गैस का स्तर बढ़ या घट सकता है।
हालांकि केवल इसी आधार पर भूकंप की भविष्यवाणी करना अभी संभव नहीं है।
क्या मिला वाडिया इंस्टीट्यूट की रिसर्च में
वाडिया इंस्टीट्यूट के भू-वैज्ञानिक डॉ. नरेश कुमार की रिसर्च Assessment of Hydrological Impact on Radon Data of MPGO, Ghuttu, During Kedarnath Flash Flood in Garhwal Himalaya, Implications for Earthquake Precursor हाल ही में Geophysics for Advancing Seismology जर्नल में प्रकाशित हुई है।
रिसर्च के अनुसार, केदारनाथ के निकट गुत्तू क्षेत्र में लगे सेंसरों से मिले आंकड़ों में
16-17 जून 2013 की आपदा के दौरान रेडॉन गैस का स्तर सामान्य सीमा से काफी अधिक दर्ज किया गया।
52 घंटे की बारिश ने बदले भू-भौतिक संकेत
15 से 17 जून 2013 के बीच केदारनाथ क्षेत्र में करीब 52 घंटे तक लगातार भारी बारिश हुई थी।
इससे फ्लैश फ्लड की स्थिति बनी और गुत्तू स्थित 68 मीटर गहरे बोरहोल में पानी का स्तर तेजी से बढ़ गया।
इस बदलाव का असर कई Geophysical Parameters पर पड़ा।
भूजल में रेडॉन गैस की मात्रा बढ़ गई, जबकि मिट्टी में मौजूद रेडॉन का स्तर घट गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, भारी जल प्रवाह ने मिट्टी की गैस को नीचे की ओर धकेल दिया, जिससे यह बदलाव देखने को मिला।
भूकंप और रेडॉन के बीच मिला संबंध
अध्ययन में रेडॉन गैस के असामान्य स्तर और भूकंप के बीच संबंध (Correlation) देखने को मिला।
लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल रेडॉन गैस के आंकड़ों के आधार पर भूकंप का समय, स्थान और तीव्रता तय नहीं की जा सकती।
इसके पीछे वजह यह है कि रेडॉन गैस का स्तर केवल टेक्टोनिक गतिविधियों से ही नहीं,
बल्कि तापमान, वायुदाब, वर्षा और स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है।
रेडॉन मॉनिटरिंग से मिल सकते हैं शुरुआती संकेत
रिसर्च में पाया गया कि यदि रेडॉन मॉनिटरिंग को सिस्मिक डेटा और भूजल स्तर के आंकड़ों के साथ जोड़ा जाए,
तो भूकंप के शुरुआती संकेतों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
Power Spectrum Analysis और Residual Radon Data के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हुआ कि बारिश
और भूजल के प्रभाव को अलग करके रेडॉन के असामान्य व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है।
2007 से गुत्तू में हो रही है लगातार मॉनिटरिंग
वाडिया इंस्टीट्यूट ने वर्ष 2007 में गुत्तू में मल्टी पैरामीट्रिक जियोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी स्थापित की थी।
यहां रेडॉन गैस के साथ कई अन्य भू-भौतिक आंकड़ों की लगातार निगरानी की जा रही है।
इसका उद्देश्य भूकंप के संभावित संकेतों का अध्ययन करना था।
हालांकि बाद में यह भी सामने आया कि रेडॉन गैस केवल भूकंप ही नहीं, बल्कि सतही और जल संबंधी बदलावों से भी प्रभावित होती है।
वैज्ञानिक बोले- रेडॉन गैस को अकेले आधार नहीं बनाया जा सकता
भू-वैज्ञानिक डॉ. नरेश कुमार के अनुसार, रेडॉन एक मूवेबल गैस है। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान पानी में इसका स्तर बढ़ गया,
जबकि मिट्टी में इसकी मात्रा कम हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि रेडॉन पानी के साथ स्थान बदल सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि रेडॉन गैस का उपयोग भूकंप के पूर्व संकेत के रूप में करना है,
तो इसे सिस्मिक गतिविधि, भूजल स्तर, मौसम और अन्य भू-भौतिक पैरामीटरों के साथ जोड़कर ही विश्लेषण करना होगा।















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