सीमान्त गांवों के ऊँचाई वाले सुरम्य बुग्यालों में भेड़ पालकों का पारंपरिक लाई मेला बड़ी धूमधाम से मनाया गया। यह मेला सदियों पुरानी परंपरा है, जिसे प्रतिवर्ष भाद्रपद की पंचमी को आयोजित किया जाता है। मेले के बाद भेड़ पालक और अधिक ऊँचाई वाले इलाकों की ओर रवाना हों जाते हैं और दीपावली के आसपास घर लौटते हैं।
परंपरा और महत्व
लाई मेला भेड़ पालकों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इसमें भेड़ों की ऊन की छटाई की जाती है और इसे शीत ऋतु आगमन का द्योतक माना जाता है। साथ ही, भेड़ पालकों के दाती त्योहार को भी विशेष रूप से मनाया जाता है, जिसमें भेड़-बकरियों के सेनापति नियुक्त करने की परंपरा है।
इन क्षेत्र में होता है आयोजन
यह मेला पवाली कांठा, टिंगरी, मदमहेश्वर, विसुणीताल, शिला समुद्र, कुलवाणी सहित त्रियुगीनारायण, तोषी, चौमासी, चिलौण्ड और रासी के ऊपरी इलाकों में बड़े हर्षोल्लास से आयोजित होता है।
सरकार से स्थानीय लोगों की मांगे
प्रधान बुरूवा मदन भट्ट ने बताया कि यदि प्रदेश सरकार ऊन व्यवसाय को बढ़ावा देती है तो लाई मेला भव्य रूप से मनाया जा सकता है तथा भेड़ पालकों की आर्थिकी और अधिक सुदृढ़ हो सकती है!
ज्येष्ठ प्रमुख राकेश नेगी ने बताया कि लाई मेला शीत ऋतु आगमन का द्योतक माना जाता है तथा काश्तकारो की बरसाती फसल से पहले भेड़ो की ऊन कटाई व छटाई की परम्परा का निर्वहन आज भी भेड पालतको द्वारा किया जा रहा है ।
भेड़ पालक प्रेम भटट् ने बताया कि ऊन का व्यवसाय धीरे – धीरे कम होने के कारण भेड़ पालकों की आजीविका खासी प्रभावित होने लगी है इसलिए लाई मेले की छटाई की गयी ऊन की लागत नहीं मिलने से भेड़ पालन व्यवसाय से ग्रामीण विमुख होते जा रहे हैं!
भेड़ पालक बीरेन्द्र धिरवाण ने बताया कि भेड़ पालक आज भी लाई मेले को भव्य रूप से मनाते है तथा लाई मेले में भेड़ पालकों के परिजन, रिश्तेदार व ग्रामीण बढ़ – चढकर भागीदारी करते हैं!
राकेश्वरी मन्दिर समिति पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने बताया कि लाई मेला मनाने की परम्परा युगों पूर्व की है तथा भेड़ पालकों द्वारा प्रतिवर्ष लाई मेला धूमधाम मनाया जाता है।
निवर्तमान प्रधान पाली सरूणा प्रेमलता पन्त ने बताया कि लाई मेला शीत ऋतु आगमन का द्योतक माना जाता है क्योकि लाई मेले के दिन भेड पालको की चालखडी ( कडी ) मे सर्दी निचले क्षेत्रो मे दशतक दे देती है ।
पूर्व प्रधान राय सिंह धर्म्वाण ने बताया कि भेड़पालको की चालखडी सिद्धवा , विद्धावा का प्रतीक माना जाता है तथा भेड पालक चालखडी की नित पूजा – अर्चना करते है ।

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