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सरोकारों से साक्षात्कार

उत्तराखंड का बालपर्व फूलदेई


अब सिर्फ फूल डालने तक सीमित नहीं रहे फुलारी

उमा घिल्डियाल
सौर संक्रांति चैत्र मास, प्रातः काल का समय, सजे-धजे बच्चे, हाथों में फूलों की टोकरियाँ, अधरों पर फूलों के गीत और प्रत्येक घर की देहली पर फूल डालते छोटे-छोटे नन्हे-मुन्ने बच्चे, जिस घर की देहली पर जाते हैं, वह घर उनके स्वागत में बिछ-बिछ जाता है। विभिन्न पकवानों से स्वागत, रूपये, चावल, गुड़, फल-मिठाइयों की भेंट और प्रसन्नता से घर के लोगों के द्वारा बच्चों का आभार व्यक्त किया जाना, एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न करता हैं। सौर पंचांग के नव वर्ष का स्वागत उत्तराखंड में इसी प्रकार किया जाता रहा है, जिसे हम बाल-पर्व के नाम से या फूलदेई पर्व के नाम से जानते हैं।


बहुत ही खूबसूरत यह पर्व उत्तराखंड का विशेष पर्व है। पन्द्रह मार्च से चौदह अप्रैल तक का समय चैत्र मास कहलाता है। इस समय जाड़ा जा रहा होता है और ग्रीष्म ऋतु आगमन की तैयारियाँ कर रही होती है। चतुर्दिक वृक्षों पर नयी कोंपलें आने लगती हैं, फूल खिल जाते हैं और गेहूँ,जौ,चना, सरसों, मटर, मसूर आदि की फसलें खेतों में लहलहा उठती हैं। सरसों के पीले फूल धरती को पीली चुनरी पहना देते हैं। ऐसे मोहक समय में बच्चे एक घर से दूसरे घर फूल डालते हुये दौड़ते हैं, तो मानवों के साथ-साथ प्रकृति भी उल्लसित हो उठती है।

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फूलदेई का अर्थ है- फूल डालना, फूल देना। लोक जीवन में तो प्राचीन काल से ही यह पर्व मनाया जाता रहा है, परन्तु लोकजागरों में भी इसका उल्लेख आता है कि वारणावत के अग्निकांड के बाद जब पाण्डव जीवन-रक्षा के लिये भाग रहे होते हैं, तो कुन्ती दुःखी होती हुई कहती है कि धृतराष्ट्र के घर के द्वारों पर फूल पड़ गये होंगे, लेकिन मेरी देहरी सूनी की सूनी ही होगी। कह सकते हैं कि यह पर्व अत्यन्त प्राचीन है। पाण्डवों का जन्म उत्तराखंड में ही हुआ था, इसलिये लोक गीतों में यह उल्लेख स्वाभाविक है। लोकगीतों में कृष्ण का उल्लेख भी है, जहाँ उनके साथी उनसे फूल डालने का आग्रह कर रहे हैं।
फूलदेई पर्व में फ्योंली या फ्यूंली नामक एक बहुत ही खूबसूरत पुष्प का विशेष महत्त्व है, जो खेतों की मेडों,भीटों, आर्द्र स्थानों पर बहुतायत से होता है। चार पंखुडियों वाला यह पुष्प अत्यन्त सुन्दर, कोमल और पीले रंग का होता है। प्रायः आसानी से न दिखाई देने वाले स्थानों पर होता हो, मानो वातारण से भयभीत हो। भय होना भी चाहिये, फूल देखते ही हम उसे तोड़ने को लालायित जो हो जाते हैं।


उत्तराखंड में यह त्योहार अब फूल डालने तक ही सीमित नहीं है, वरन् अब विभिन्न प्रकार की शोभ-यात्राओं, रंगोलियों की प्रतियोगिता, लोकगीतों, लोकनृत्यों आदि के आयोजनों तक विस्तार पा गया है। देवताओं की डोलियों को सजाना उन्हें भ्रमण कराना भी इसमें सम्मिलित है।

फ्यूँली और वसंत


चैत्र मास उत्तराखंड के परम्परागत ढोल-दमौ वादकों, जिन्हें औजी जी, सम्मानपूर्वक बुलानाद्ध कहा जाता है, को समर्पित है। ये वादक इस पूरे माह में अपने यजमानों के यहाँ नौबत बजाने, नववर्ष की बधाई देने , देवताओं को नचाने, धियाण ( विवाहित पुत्री) की कुशल लेने, उसके बच्चों की बधाई देने जाते हैं। समाज को बाँधे रखने और उसका भावनामूलक ताना-बाना बनाने में इन पर्वों का विशेष महत्त्व है। इन पर्वों के आत्मिक मूल्यों को समझना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी है इन्हें भौतिक रूप से मनाना। उत्तराखंड में शिक्षा -विभाग इस ओर ध्यान दे रहा है और इस पर्व को विधिवत् मनाने के लिये कई कदम उठा रहा। शुभत्व ही शिव है एवं शिव में ही कल्याण है। प्रकृति को बनाये रखें, उसके साथ रहें, वह सदैव हमारे लिये उपहार लेकर उपस्थित रहेगी। यह उसका स्वागत और अभिनन्दन है। हृदय से करें और सुखी रहें।

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