दावों और जमीनी सच के बीच वनाग्नि का खतरा
अप्रैल का सूरज चढ़ते ही उत्तराखंड एक बार फिर दावों और जमीनी सच के द्वंद्व में फंस गया है।
एक तरफ शासन-प्रशासन की फाइलों में ‘प्रेसिडेंट कलर्स’ और ‘बेहतर आपदा प्रबंधन’ के तमगे चमक रहे हैं,
तो दूसरी तरफ वनाग्नि की पहली आहट ने पहाड़ के फेफड़ों को डराना शुरू कर दिया है।
हर साल की तरह इस बार भी वन विभाग के पास संसाधनों के नाम पर केवल आश्वासनों की पोटली है,
जबकि हमारे जंगल और उनमें बसने वाले जीव धू-धू कर जलने को मजबूर हैं।
चारधाम यात्रा, सड़कें और जमीनी सुरक्षा के सवाल
चारधाम यात्रा की तैयारियों का सारा जोर इस बार भी केवल ‘हेली सेवाओं’ और ‘ऑनलाइन पंजीकरण’
जैसे हाई-टेक तामझाम तक सिमट कर रह गया है।
असल सवाल उन खस्ताहाल सड़कों और चिह्नित ‘डेंजर ज़ोन’ का है, जो हर साल यात्रियों और स्थानीय निवासियों के लिए मौत का फांस बनते हैं।
प्रशासन जब सुरक्षा के ‘मॉकड्रिल’ की फोटो जारी करता है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि सुदूर गांवों में
आज भी स्वास्थ्य सुविधाएं वेंटिलेटर पर क्यों हैं?
क्या यात्रा का सफल होना केवल वीआईपी दर्शन और आंकड़ों की बाजीगरी तक सीमित है?
ऑल-वेदर रोड के मलबे से सिसकती नदियाँ और दरकते पहाड़ आज भी किसी ठोस नीति की बाट जोह रहे हैं।
बिजली, आपदा फंड और गांवों की हकीकत
बिजली दरों में बढ़ोतरी न करना एक राजनीतिक राहत हो सकती है, लेकिन यह उन गांवों के लिए बेमानी है जहाँ आज भी वोल्टेज की लुकाछिपी और अघोषित कटौती ने जीवन दूभर कर रखा है।
ऊर्जा प्रदेश होने के बावजूद हमारे गाँव अंधेरे में रहें और उद्योगों को सस्ती बिजली का प्रलोभन दिया जाए, यह कैसा न्याय है?
आपदा फंड के रूप में मिलने वाले करोड़ों रुपये आखिर किस ‘रिस्क रिडक्शन’ पर खर्च होते हैं,
जब आज भी मामूली बारिश में संपर्क मार्ग हफ्तों तक कटे रहते हैं और गर्भवती महिलाओं को डोली में लादकर अस्पताल पहुँचाना पड़ता है?
डिजिटल जनगणना, पलायन और सीमांत जिलों की पीड़ा
डिजिटल जनगणना और इतिहास के पन्नों को पलटने जैसे कदम बौद्धिक विमर्श के लिए अच्छे हो सकते हैं,
लेकिन उस युवा का क्या जो रोजगार के अभाव में पलायन को ही एकमात्र विकल्प मान बैठा है?
‘रजत जयंती वर्ष’ मनाते राज्य के लिए यह शर्मनाक है कि उसके सीमांत जिले आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
उपलब्धियों के जश्न के बीच व्यवस्था को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता की चुप्पी उसकी संतुष्टि नहीं, बल्कि उसका गहरा असंतोष है।
कागजी आंकड़ों से न पेट भरता है, न ही खोखले आश्वासनों से पहाड़ सुरक्षित होते हैं। जवाबदेही फाइलों में नहीं, धरातल पर दिखनी चाहिए।

















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