डॉ. अतुल शर्मा ने साझा कीं यादें
जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की 16वीं पुण्यतिथि पर शनिवार को नैनीताल में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।
इस मौके पर वरिष्ठ नागरिक जनसेवा समिति की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम में गिर्दा के सामाजिक, सांस्कृतिक और जन आंदोलनों में योगदान को याद किया जाएगा।
गिर्दा को करीब से जानने वाले वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अतुल शर्मा ने उनकी पुण्यतिथि पर उनसे जुड़ी कई यादें साझा की हैं।
उन्होंने बताया कि चिपको आंदोलन से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन और नदी बचाओ जनआंदोलन तक गिर्दा के साथ काम करने के दौरान उनके साथ कई अविस्मरणीय अनुभव जुड़े।
डॉ. शर्मा ने नैनीताल के नुक्कड़ नाटक समारोह की याद साझा करते हुए बताया कि युगमंच नैनीताल के
आयोजन में मल्ली ताल से तल्लीताल तक सांस्कृतिक यात्रा निकाली गई थी।
इस दौरान गिर्दा के साथ जनगीत गाते हुए लोग आगे बढ़े थे।
उन्होंने बताया कि इस यात्रा में उनका जनगीत ‘अब तो सड़कों पर आओ’ भी लोगों ने दोहराया था।
र्दा के साथ बल्ली सिंह चीमा, शेखर पाठक और राजीव लोचन साह जैसे लोग भी इस सांस्कृतिक यात्रा में शामिल रहे।

जहरीखाल में हुई थी पहली मुलाकात
डॉ. अतुल शर्मा ने बताया कि गिर्दा से उनकी पहली मुलाकात जहरीखाल में हुई थी।
उस समय वह गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर में शोधकार्य कर रहे थे।
वरिष्ठ कवि और हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. हरिमोहन के साथ वह जहरीखाल पहुंचे थे।
वहां महान जनकवि बाबा नागार्जुन के 75वें जन्मदिन के अवसर पर कवि गोष्ठी आयोजित हुई थी।
इसी कार्यक्रम में पहली बार गिर्दा से मुलाकात हुई।
डॉ. शर्मा के अनुसार, गिर्दा ने वहां ‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के’ और ‘ततुक नी लगा उदेख’ जैसे जनगीत सुनाए। इसके बाद दोनों के बीच निकटता बढ़ती चली गई।
उत्तराखंड आंदोलन में भी साथ रहे
डॉ. शर्मा ने बताया कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान गिर्दा लगातार जनगीतों के माध्यम से आंदोलन से जुड़े रहे।
वह पूरे उत्तराखंड में प्रभात फेरियों और जनसभाओं में शामिल होते थे।
उत्तरकाशी में आयोजित जनकवि सम्मेलन में भी दोनों साथ रहे।
यात्रा के दौरान भूस्खलन के कारण रास्ता बाधित होने पर कुछ लोग पैदल चले और कुछ ट्रक से आगे बढ़े।
डॉ. शर्मा के मुताबिक, आंदोलन के दौरान गिर्दा रोज चार पंक्तियां लिखते थे, जिन्हें नैनीताल समाचार के बुलेटिन में प्रस्तुत किया जाता था।
‘हिमालय की गूंज’ कार्यक्रम में हुई आखिरी मुलाकात
डॉ. अतुल शर्मा ने गिर्दा के साथ अपनी आखिरी मुलाकात का भी जिक्र किया।
उन्होंने बताया कि देहरादून में आयोजित ‘हिमालय की गूंज’ कार्यक्रम में गिर्दा, नरेंद्र सिंह नेगी और डॉ. अतुल शर्मा ने जनआंदोलनों से जुड़े गीत प्रस्तुत किए थे।
कार्यक्रम के दौरान गिर्दा ने पेट में दर्द की शिकायत की थी। वह काफी परेशान नजर आ रहे थे।
डॉ. शर्मा के अनुसार, यही उनसे उनकी आखिरी मुलाकात थी।

सम्मान के मौके पर भी याद आए गिर्दा
डॉ. शर्मा ने बताया कि इसी वर्ष उत्तराखंड भाषा संस्थान की ओर से उन्हें दीर्घकालीन साहित्य सेवा के लिए सम्मानित किया गया।
उनके साथ कहानीकार शैलेश मटियानी और जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ को भी सम्मान दिया गया, जिसमें गिर्दा और मटियानी को मरणोपरांत सम्मान मिला।
डॉ. शर्मा ने बताया कि सम्मान समारोह में गिर्दा के पुत्र ने उनसे मिलकर कहा कि उन्हें देखकर ऐसा लगा जैसे गिर्दा से मुलाकात हो गई हो।
गिर्दा की पत्नी ने भी उनसे उनका पसंदीदा जनगीत ‘नदी तू बहती रहना’ सुनाने का आग्रह किया।
डॉ. अतुल शर्मा ने कहा कि गिर्दा उनके लिए केवल एक जनकवि नहीं थे,
बल्कि आंदोलन, संस्कृति और जनसरोकारों से जुड़ी उनकी लंबी यात्रा के अभिन्न साथी थे। आज भी उनकी स्मृतियां उनके साथ हैं।















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