जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की 16वीं पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार और
सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता चारु तिवारी ने उत्तराखंड के मौजूदा हालात
और गिर्दा के विचारों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि गिर्दा ने जिन मुद्दों को दशकों पहले अपनी कविताओं और जनगीतों के जरिए उठाया था, वे आज भी उत्तराखंड के सामने गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
रोजगार और पलायन पर चिंता
चारु तिवारी ने कहा कि उत्तराखंड में आज रोटी और रोजगार के साधनों का संकट बढ़ रहा है।
उनके अनुसार पिछले वर्षों में कई औद्योगिक और रोजगार से जुड़े संस्थान बंद हुए हैं, जिससे पहाड़ के युवाओं के सामने रोजगार का संकट गहरा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस पहाड़ में गिर्दा ने युवाओं में चेतना जगाई और सामाजिक आंदोलनों को आवाज दी,
उसी पहाड़ में आज लोगों को अपने जंगल और पेड़ों को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
जल-जंगल-जमीन के सवाल आज भी कायम
चारु तिवारी ने कहा कि 70 और 80 के दशक में युवा चेतना के निर्माण में गिर्दा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उन्होंने आम लोगों को अपने अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक किया।
उन्होंने नदियों में खनन और बजरी के कारोबार का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक
संसाधनों पर आखिर किसका अधिकार है और इनके दोहन का सबसे ज्यादा नुकसान किसे उठाना पड़ रहा है।
विकास के बीच बुनियादी सुविधाओं का सवाल
चारु तिवारी ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और
रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं जनता का अधिकार हैं,
लेकिन पहाड़ की महिलाओं को आज भी प्रसव के दौरान अस्पताल पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
उन्होंने उपलब्ध आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों में प्रसव पीड़ा के
दौरान महिलाओं की मौत का आंकड़ा 657 तक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है।
गिर्दा के सवालों पर फिर सोचने की जरूरत
चारु तिवारी ने कहा कि गिर्दा को केवल उनकी पुण्यतिथि पर याद करने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
उनके गीतों और विचारों में आम आदमी के संघर्ष, पहाड़ के दर्द और प्राकृतिक संसाधनों की चिंता दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड गठन के 26 वर्ष बाद यह सवाल जरूरी है कि क्या राज्य उन सपनों और सवालों का जवाब दे पाया है,
जिन्हें गिर्दा ने अपनी रचनाओं और आंदोलनों के जरिए समाज के सामने रखा था।
रानू बिष्ट ओबेरॉय उत्तराखंड की प्रिंटिंग-पब्लिशिंग जगत की प्रमुख हस्तियों में हैं। वे ‘समय साक्ष्य’ की एमडी और प्रकाशक हैं और राज्य में महिला प्रकाशन उद्यमिता की अग्रणी पहचान के रूप में जानी जाती हैं।















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