रीजनल रिपोर्टर

सरोकारों से साक्षात्कार

गिर्दा की 16वीं पुण्यतिथि पर श्रीनगर में श्रद्धांजलि

अलकनंदा में खनन और पहाड़ कटान पर उठे सवाल

जनकवि गिरीश चंद्र तिवारी ‘गिर्दा’ की 16वीं पुण्यतिथि पर श्रीनगर गढ़वाल में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

इस दौरान गिर्दा के गीतों और कविताओं को याद करते हुए उनके विचारों, पहाड़ के प्रति उनकी संवेदनशीलता और आम जनता के संघर्ष में उनकी भूमिका पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि गिर्दा की रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

उनके गीतों में पहाड़, प्रकृति, पर्यावरण और आम आदमी के संघर्ष की तस्वीर साफ दिखाई देती है।

गिर्दा ने अपने शब्दों के माध्यम से सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों को लोगों तक पहुंचाने का काम किया।

गिर्दा की पंक्तियों में दिखती है आज के पहाड़ की तस्वीर

कार्यक्रम में गिर्दा की चर्चित पंक्तियों “एक तरफ बर्बाद बस्तियां, एक तरफ हो तुम… एक तरफ सूखी नदियां, एक तरफ हो तुम” को याद किया गया।

वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड में मौजूदा पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए गिर्दा की ये पंक्तियां आज भी बेहद प्रासंगिक नजर आती हैं।

अलकनंदा में खनन और पहाड़ कटान पर चिंता

इस दौरान अलकनंदा नदी में हो रहे खनन और पहाड़ों के लगातार कटान पर भी चिंता जताई गई।

वक्ताओं ने कहा कि विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही है।

नदियों में खनन और पहाड़ों के कटान का सीधा असर पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में विकास की योजनाओं के साथ पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

सामाजिक आंदोलनों की आवाज बने थे गिर्दा

वक्ताओं ने कहा कि गिर्दा सिर्फ जनकवि नहीं थे, बल्कि वह आम जनता की आवाज थे।

उनके गीतों में पहाड़ का दर्द, संघर्ष और भविष्य के सपने दिखाई देते हैं।

चिपको आंदोलन से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक गिर्दा के गीतों ने लोगों के बीच चेतना पैदा करने का काम किया।

उनकी रचनाओं ने जल, जंगल, जमीन और आम लोगों के अधिकारों से जुड़े सवालों को मजबूती से उठाया।

विचारों को आगे बढ़ाना ही सच्ची श्रद्धांजलि

कार्यक्रम में कहा गया कि गिर्दा को याद करना केवल उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

उनके विचारों और जनसरोकारों को मौजूदा परिस्थितियों से जोड़कर देखने की जरूरत है।

वक्ताओं ने कहा कि आज उत्तराखंड के सामने पर्यावरण संरक्षण, नदियों का अस्तित्व, जंगल, पहाड़ और स्थानीय लोगों के अधिकार जैसे सवाल खड़े हैं।

ऐसे में गिर्दा के गीत और विचार समाज को इन मुद्दों पर सोचने और आवाज उठाने की प्रेरणा देते हैं।

कार्यक्रम के दौरान गिर्दा के गीतों और उनकी स्मृतियों को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।

https://youtu.be/Nw4bM-WdvFE?si=SkLm6d3RynAlmRhM
https://regionalreporter.in/girdha-16th-death-anniversary-charu-tiwari-jal-jungle-jameen-rojgar/
+ posts

रानू बिष्ट ओबेरॉय उत्तराखंड की प्रिंटिंग-पब्लिशिंग जगत की प्रमुख हस्तियों में हैं। वे ‘समय साक्ष्य’ की एमडी और प्रकाशक हैं और राज्य में महिला प्रकाशन उद्यमिता की अग्रणी पहचान के रूप में जानी जाती हैं।

Leave a Reply

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *