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हसदेव अरण्य मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम

PEKB कोयला ब्लॉक पर केंद्र-राज्य से मांगा जवाब

हसदेव अरण्य के PEKB कोयला ब्लॉक से जुड़े सामुदायिक वन अधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम सुनवाई की।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र, छत्तीसगढ़ सरकार और RRVUNL समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।

सामुदायिक वन अधिकारों पर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने यह पता लगाने के लिए जवाब मांगा है कि घाटबर्रा गांव के निवासियों के सामुदायिक वन अधिकार वास्तव में मौजूद थे या नहीं।

अदालत ने कहा कि यदि ऐसे अधिकार मौजूद थे, तो उन्हें लागू करने के लिए संभावित सुधारात्मक कदमों पर विचार किया जाएगा।

पीठ ने स्पष्ट किया कि नोटिस जारी होने से PEKB कोयला ब्लॉक में चल रही खनन गतिविधियां फिलहाल प्रभावित नहीं होंगी।

चार पक्षों को जारी हुआ नोटिस

पीठ ने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और छह अन्य लोगों की याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

नोटिस केंद्र सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम और सरगुजा की जिला स्तरीय वन अधिकार समिति को भेजा गया है।

याचिकाकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 21 अप्रैल 2026 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

हाई कोर्ट के फैसले को दी चुनौती

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ग्रामीणों और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति की अपील खारिज कर दी थी।

मामले में घाटबर्रा ग्रामीणों के सामुदायिक वन अधिकारों को रद्द करने और PEKB के दूसरे चरण के खनन को चुनौती दी गई थी।

हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, घाटबर्रा गांव के ग्रामीणों को पहले सामुदायिक वन अधिकार दिए गए थे, जिन्हें बाद में रद्द कर दिया गया।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन अधिकारों को रद्द करने और वन भूमि के इस्तेमाल से जुड़े फैसलों में कानून का पालन नहीं हुआ।

क्या है सामुदायिक वन अधिकार

सामुदायिक वन अधिकार वन अधिकार अधिनियम के तहत स्थानीय समुदायों को पारंपरिक वन संसाधनों के संरक्षण और उपयोग से जुड़े अधिकार देते हैं।

हसदेव अरण्य मामले में यही अधिकार कोयला खनन और वन भूमि के इस्तेमाल से जुड़े विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं।

अब आगे क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट अब संबंधित पक्षों के जवाब मिलने के बाद यह जांचेगा कि ग्रामीणों के

सामुदायिक वन अधिकार कानूनी रूप से मौजूद थे या नहीं।

अगर अदालत अधिकारों के अस्तित्व को स्वीकार करती है,

तो उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उचित कानूनी उपायों पर आगे विचार किया जा सकता है।

इस मामले में अब तक क्या हुआ?

घाटबर्रा के ग्रामीणों को सामुदायिक वन अधिकार दिए गए थे,

लेकिन 2016 में जिला स्तरीय समिति ने इन अधिकारों को रद्द कर दिया था।

इसके बाद ग्रामीणों और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने अदालतों का रुख किया

और खनन मंजूरियों को भी चुनौती दी।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी विवाद से जुड़े एक मामले में अपील

स्वीकार करते हुए वन अधिकारों के सवाल को न्यायिक जांच के दायरे में रखा था।

अब 24 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ताजा याचिका पर नोटिस जारी किया है,

लेकिन PEKB में मौजूदा खनन गतिविधियों पर फिलहाल रोक नहीं लगाई है।

https://youtu.be/Nw4bM-WdvFE?si=fgPTJ_kqq4iW9w_U

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