स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली
कक्षा 11 की छात्रा की याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने 21 अगस्त को यह फैसला सुनाया, जो अब सार्वजनिक हुआ है।
छात्रा ने कोर्ट से क्या मांग की थी
मामला प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल से जुड़ा है,
जहां छात्रा ने कक्षा 11 में प्रवेश के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
छात्रा का कहना था कि वह कक्षा 6 से स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनती रही है।
उसके मुताबिक, कक्षा 6 से 10 तक स्कूल ने हिजाब को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
कक्षा 10 पास करने के बाद जब उसने कक्षा 11 में प्रवेश मांगा, तब स्कूल ने ड्रेस कोड का हवाला दिया।
छात्रा ने आरोप लगाया कि हिजाब पहनने की शर्त के कारण स्कूल ने उसे कक्षा 11 में प्रवेश देने से इनकार किया।
छात्रा की दलील क्या थी
याचिका में छात्रा ने हिजाब पहनने को अपनी धार्मिक आस्था से जुड़ा बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला दिया था।
उसका तर्क था कि निर्धारित यूनिफॉर्म के ऊपर हिजाब पहनने की अनुमति देने से स्कूल की यूनिफॉर्म व्यवस्था प्रभावित नहीं होगी।
छात्रा की ओर से यह भी कहा गया कि वह पहले से इसी तरीके से स्कूल आती रही है।
हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
हाईकोर्ट ने कहा कि छात्रा अदालत के सामने ऐसा पर्याप्त धार्मिक या कानूनी आधार नहीं रख सकी,
जिससे हिजाब जरूरी धार्मिक प्रथा साबित हो।
कोर्ट के मुताबिक, सिर्फ किसी प्रथा को धार्मिक बताना उसे संविधान के
अनुच्छेद 25 के तहत स्वतः संरक्षण देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि पहले कुछ वर्षों तक स्कूल द्वारा आपत्ति नहीं जताना
छात्रा के स्थायी अधिकार को स्थापित नहीं करता।
कोर्ट ने स्कूल के समान ड्रेस कोड को अनुशासन, समानता और संस्थागत पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण नियम माना।
स्कूल को यूनिफॉर्म तय करने का अधिकार
अदालत ने माना कि निजी स्कूल समान और गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस कोड लागू कर सकता है,
बशर्ते नियम सभी विद्यार्थियों पर लागू हो।
कोर्ट ने कहा कि छात्र अपनी व्यक्तिगत या धार्मिक पसंद के आधार पर
निर्धारित यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग अधिकार के रूप में नहीं कर सकता।
अदालत ने धर्मनिरपेक्ष शैक्षणिक माहौल और विद्यार्थियों के बीच समानता बनाए रखने में यूनिफॉर्म की भूमिका पर भी जोर दिया।
कोर्ट ने कर्नाटक हिजाब केस का जिक्र क्यों किया?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के 2022 के चर्चित हिजाब फैसले का भी उल्लेख किया।
15 मार्च 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर रोक से जुड़ी याचिकाएं खारिज की थीं।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने तब कहा था कि हिजाब पहनना इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित नहीं हुआ
और यूनिफॉर्म लागू की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी,
जहां दो जजों की पीठ ने अलग-अलग राय दी।
13 अक्टूबर 2022 को जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने विभाजित फैसला सुनाया था।
जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने अपीलों को स्वीकार किया।
मतभेद के कारण मामला उचित बड़ी पीठ के गठन के लिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया गया था।
इसी वजह से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से इस मुद्दे पर अंतिम बहुमत वाला फैसला अभी नहीं आया है।
पहले भी हिजाब पर आए हैं ऐसे फैसले
हिजाब को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट का 2022 का फैसला देश में इस मुद्दे पर सबसे चर्चित न्यायिक फैसलों में शामिल रहा है।
उस मामले में अदालत ने यूनिफॉर्म नियम और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दावे के बीच संतुलन पर विचार किया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब इसी कानूनी दृष्टिकोण का सहारा लेते हुए प्रयागराज के स्कूल मामले में छात्रा को राहत देने से इनकार किया है।
हालांकि, यह फैसला हर स्कूल और हर परिस्थिति में हिजाब पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने वाला फैसला नहीं है।
इस मामले में अदालत ने मुख्य रूप से छात्रा के धार्मिक अधिकार के दावे और संबंधित स्कूल की यूनिफॉर्म नीति की वैधता पर विचार किया।
फैसले का सीधा मतलब
इस फैसले का मतलब यह है कि संबंधित स्कूल अपनी समान यूनिफॉर्म नीति लागू कर सकता है और छात्रा हिजाब के लिए अपवाद मांग नहीं सकती।
अदालत ने खास तौर पर कहा कि याचिका में हिजाब को इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं दी गई थी।
यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में हिजाब को स्कूल यूनिफॉर्म से अलग धार्मिक अधिकार के रूप में लागू करने की मांग स्वीकार नहीं की।















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