उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोककथाओं और नाट्य कला को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाले साहित्यकार और रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली का निधन हो गया।
गुरुवार, 21 अगस्त देर रात अल्मोड़ा के चितई गाँव स्थित उनके पैतृक आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 79 वर्ष के थे। उनके निधन से पूरे उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि भारतीय लोक साहित्य और लोक संस्कृति जगत में गहरा शोक व्याप्त है।
पैतृक आवास पर अंतिम संस्कार
परिवार के अनुसार शुक्रवार सुबह 10:30 बजे चितई से दलबैंड घाट तक उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई। इस दौरान साहित्यकारों, कलाकारों और आम जनों की भारी भीड़ उमड़ी। उनके निधन पर राज्यभर से संवेदनाएँ व्यक्त की जा रही हैं।
जीवन परिचय
जुगल किशोर पेटशाली का जन्म 7 सितंबर 1946 को अल्मोड़ा जिले के चितई के पास पेटशाल गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम स्व. हरिदत्त पेटशाली और माता का नाम लक्ष्मी पेटशाली था।
बचपन से ही वे कुमाऊँनी लोककला, परंपराओं और लोक संगीत से गहराई से जुड़े रहे। आर्थिक परिस्थितियों के चलते औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाए, लेकिन स्वाध्याय और लोक परंपरा से जुड़े अध्ययन ने उन्हें साहित्य और रंगमंच की दुनिया में एक खास पहचान दिलाई।
पेटशाली ने 1990 में अपनी पहली किताब “राजुला मालूशाही” लिखी। तीन साल बाद इसे संगीत नाटिका के रूप में फिल्मांकित किया गया और दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया।
15वीं शताब्दी की इस अमर प्रेम गाथा को उन्होंने कुमाऊँनी भाषा की 34 पारंपरिक लोक धुनों पर तैयार किया था। इसमें छपेली, चांचरी, झोड़ा, बैर, भगनौल, न्योली और जागर जैसी लोक विधाओं का उपयोग किया गया।
इसी कृति ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई और इसके लिए उन्हें जयशंकर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान
पेटशाली ने अपने लेखन और मंचन से कुमाऊँनी लोककथाओं, ऐतिहासिक गाथाओं और लोक परंपराओं को नई पहचान दी। उनकी चर्चित नाट्य कृतियों में राजुला–मालूशाही, बाला गोरिया, अजुवा–बफौल और नौ–लखा दीवान शामिल हैं।
इसके अलावा उन्होंने “जी रया जागि रया” (कुमाऊँनी कविता संग्रह), “विभूति योग” (गीता भावानुवाद), “गंगनाथ-गीतावली” और “हे राम” जैसी रचनाएँ भी दीं।
अब तक वे 18 पुस्तकें लिख चुके थे और अस्वस्थ होने के बावजूद अंतिम समय तक लेखन कार्य जारी रखा।
लोक-संस्कृति संग्रहालय की स्थापना
साल 2003 में उन्होंने चितई, अल्मोड़ा में लोक-संस्कृति संग्रहालय की स्थापना की। इसमें 70 से अधिक चित्र, 30 पारंपरिक वाद्य यंत्र, प्राचीन बर्तन, ग्रामोफोन और दुर्लभ पांडुलिपियाँ संजोई गईं।
स्वास्थ्य कारणों से बाद में इस संग्रह को उन्होंने दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र को समर्पित कर दिया, जहाँ आज यह “जुगल किशोर पेटशाली संग्रह” के नाम से संरक्षित है।
सम्मान और पुरस्कार
पेटशाली को उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले।
- जयशंकर प्रसाद पुरस्कार (1993)
- कुमाऊँ गौरव सम्मान (2005)
- सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार
- वरिष्ठ संस्कृति कर्मी पुरस्कार (उत्तराखंड सरकार)
संगीत नाटक अकादमी अमृत पुरस्कार (2022) -यह सम्मान उन्हें लोक संगीत, लोक कला और प्रदर्शन कला में समग्र योगदान के लिए दिया गया। अमृत अवार्ड के तौर पर उन्हें एक लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की गई।
शोक की लहर
राज्यभर के साहित्यकारों, कलाकारों और सामाजिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया है। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि जुगल किशोर पेटशाली ने न केवल लोककथाओं को सहेजा बल्कि उन्हें आधुनिक मंच देकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य किया। उनकी रचनाएँ और योगदान सदैव उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बने रहेंगे।

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