रेशमा पंवार
उत्तराखण्ड की सामाजिक, सांस्कृतिक पत्रिका ‘पहाड़’ का अंक 19 को पढ़ा था जिसे पढ़कर हमने गिर्दा को जाना। गढ़वाल में लोकसंगीत के गौरव, गढ़वाली भाषा संस्कृति को शिखर पर पहुंचाने वाले गढ़गौरव नरेन्द्र सिंह नेगी जी हैं तो कुमाऊँ भाषा और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने वाले पुरोधा गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ हैं।
इसी पत्रिका में हेमलता तिवारी (गिर्दा की पत्नी) का लेख पढ़ा जिसमें वे लिखती हैं कि “एक समय था जब घर पर बहुत लोग आते थे और बहुत अच्छा लगता था। अब नहीं आते हैं तो अच्छा नहीं लगता…” तब से सोचा था एक बार ‘गिर्दा’ के कुमाऊं जरूर जाएंगे।
नैनीताल जाकर हेमलता जी से मिले तो जनकवि की जो स्मृतियां हमने अपनी यादों में बनाई थी वो दौड़ पड़ी। वो एक ईजा की तरह सरल स्वभाव की हैं इतना सरलपन की खुद ही तमाम किस्से बीच -बीच में गिर्दा के बताने लगती।
वे कहती हैं “गिर्दा जब जिंदा थे तब मैंने उनकी रचनाएं नहीं पढ़ी। घर में आने-जाने वालों की आवभगत में लगी रहती थी उनके द्वारा जनांदोलनों में गाये हुए गीतों को ही सुना था या वो जो नया लिखते थे तो मुझे सुनाते। उनके जाने के बाद अब उन्हें पढ़ती हूं, तब देखती हूं कितना कुछ लिखा है उन्होंने।
जब मेरी शादी ‘गिर्दा’ से तय हुई तो बड़ी दीदी और अन्य लोगों ने बहुत मना किया कि उनसे शादी न करुं, लेकिन बाद में जब उन्होंने ‘गिर्दा’ को जाना तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से इतना प्रभावित हुए कि मुझे कहने लगे “तुम उनके (गिर्दा) के लायक नहीं थी यह व्यक्ति जमीन का नहीं आसमान का है।” दीदीयों ने हमारी बहुत मदद की।
घर में आने-जाने वालों का जमावड़ा लगा रहता था। छात्र, आंदोलनकारी, साहित्यकार- संगीतकार आदि जिसमें केशव अनुरागी (गढ़वाल के ढोलवादक), हरिया सूरदास (रमोल गायक), बृजेन्द्र लाल शाह, झूसिया दमाई (भड़वा गायक) खूब घर पर आते-जाते थे।
झूसिया दमाई पर गिर्दा ने दो अन्य लोगों के साथ मिलकर शोध प्रोजेक्ट किया। उन्हें उस प्रोजेक्ट का पैसा दिलवाया। स्वयं कुछ नहीं लिया। बृजेन्द्र लाल शाह को गिर्दा अपना गुरु मानते थे। उन्हीं से बबा (गिर्दा) को विरासत में सारी लोक धुनें मिली। वे गिर्दा को अपना सर्वाधिकार दे गए थे।
वे अपनी रचनाओ को भी नहीं छपवाते थे। पैसा कमाना वे साहित्य का उद्देश्य नहीं मानते थे। कहते थे प्रकाशकों का घर में क्यों भरूं? जनकवि है जनता के लिए लिखता हूँ, जन को ही लौटाऊंगा।
हिंदी के प्रगतिशील जाने-माने साहित्यकार घुमक्कड़ कवि बाबा नागार्जुन भी घर पर आते रहते थे। वही बड़ा झोला टाँग आते और चटाई पर ही सो जाते थे। मेरे बेटे के जन्म के समय भी आए थे। उन्होंने ही उसका नाम ‘तुहिन’ रखा। नागार्जुन ने अपने जन्मदिन पर बबा को घड़ी दी थी वो अभी भी मेरे पास है। .बाबा नागार्जुन गिर्दा को बहुत मानते थे।
वह आगे कहती कि-“मैं गढ़वाल भी आई हूँ गिर्दा के साथ। जब पौड़ी में नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ उनकी जुगलबंदी हुई थी। हमारा संयुक्त परिवार था। पिताजी उदार सोच के व्यक्ति थे और हमें भी स्वतंत्र सोचने के लिए प्रोत्साहित करते थे। सब सोचते हैं हम बहिनों को हाई-फाई लड़का चाहिये होगा पर हम संयुक्त परिवार में अनेक मूल्यबोध को समेटकर चले।
तो इस प्रकार हमें गिर्दा के जीवन के कुछ नई अनकही कहानी-किस्सों के बारे में पता चला। गिर्दा को जनकवि, लोकगीतकार बनाने में हेमलता जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वो कर्मठ, जुझारू और जिजीविषा की धनी हैं, जिनसे मिलना गिर्दा को जानने जैसा ही है।

Leave a Reply