गंगा असनोड़ा
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अपनी
‘पहाड़ी टोपी’ और ‘स्थानीय बोली’ से जनता का दिल जीतने की कोशिश की।
लेकिन क्या प्रधानमंत्री की यह भावुक अपील उन कड़वे सवालों को ढक पाएगी, जो आज उत्तराखंड का हर नागरिक ‘डबल इंजन’ सरकार से पूछ रहा है?
हाईकमान का भरोसा बनाम स्थानीय नाराजगी
मंच पर मोदी और धामी की ‘केमिस्ट्री’ ने यह तो साफ कर दिया कि मुख्यमंत्री को दिल्ली का पूरा समर्थन प्राप्त है,
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि क्या यह ‘नजदीकी’ जनता के काम आ रही है?
सवाल यह है कि अंकिता भंडारी केस से लेकर भर्ती घोटालों तक, जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा है,
जो सरकार की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट है।
ऐसे में मोदी द्वारा धामी को ‘कर्मठ’ कहना क्या केवल चुनावी डैमेज कंट्रोल नहीं है?
दावों और हकीकत में अंतर
प्रधानमंत्री ने पूर्व में कई घोषणाएं कीं, लेकिन उनमें से कितनी ‘पटरी’ पर हैं, यह बहस का विषय है।
विकास के अधूरे प्रोजेक्ट्स
ऑल वेदर रोड और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन जैसे प्रोजेक्ट्स विकास के प्रतीक तो हैं,
लेकिन इनके कारण हो रहे भूधंसाव (जैसे जोशीमठ, कर्णप्रयाग, श्रीनगर)
और पर्यावरणीय नुकसान ने स्थानीय लोगों में ‘विकास’ के प्रति एक डर और अविश्वास पैदा किया है।
पलायन का दंश
एक्सप्रेस-वे से दिल्ली की दूरी तो कम हो रही है, लेकिन क्या इससे पहाड़ के गांवों से हो रहा पलायन रुक रहा है?
बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव में ‘लोकल कनेक्ट’ केवल भाषणों तक सीमित नजर आता है।
‘डबल इंजन’ का बोझ या ताकत?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या ‘डबल इंजन’ का फायदा केवल बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मिल रहा है?
उत्तराखंड पर थोपी गई कुछ केंद्रीय योजनाओं को लेकर स्थानीय विशेषज्ञों का मानना है कि ये पहाड़ की नाजुक पारिस्थितिकी (Ecology) के अनुकूल नहीं हैं।
‘टॉप-डाउन’ एप्रोच (दिल्ली से थोपी गई योजनाएं) ने स्थानीय स्वायत्तता को कहीं न कहीं चोट पहुंचाई है।
एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को ढंकने की कोशिश
भाषण में गढ़वाली-कुमाऊंनी शब्दों का तड़का लगाना मोदी जी की पुरानी और सफल कला है।
जानकारों का मानना है कि जब-जब सरकार के खिलाफ जमीनी गुस्सा (Anti-incumbency) बढ़ता है,
तब-तब ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘भावुकता’ का सहारा लिया जाता है।
प्रधानमंत्री का यह ‘चिर-परिचित अंदाज’ दरअसल उस गुस्से को शांत करने की एक रणनीतिक कोशिश भी हो सकती है,
जो महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय प्रशासनिक ढिलाई के कारण पनप रहा है।
भरोसे की कसौटी
मुख्यमंत्री धामी की मोदी के साथ नजदीकी भले ही संगठन के भीतर उनकी स्थिति मजबूत करे,
लेकिन ‘आम पहाड़ी’ के लिए असली पैमाना भाषण नहीं, बल्कि उसके जीवन में आया बदलाव है।
क्या ये शानदार एक्सप्रेस-वे उत्तराखंड के आम आदमी की उम्मीदों को भी रफ्तार देंगे, या फिर ये केवल चुनावी विज्ञापनों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे?
















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