यही है क्या वो तीसरा दशक जिसे उत्तराखंड का दशक कहते हो ?
क्या केशव नेगी सिर्फ इसलिए दोषी हैं क्योंकि वह वहां काम करते थे?
गजेंद्र रावत
दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड ने कई परिवारों को दर्द दिया है। इस हादसे में जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनकी पीड़ा की भरपाई कभी नहीं हो सकती।inka
लेकिन इस त्रासदी के बीच एक सवाल उत्तराखंड के युवा शेफ केशव नेगी की गिरफ्तारी को लेकर भी खड़ा हो रहा है।
केशव नेगी कोई बिल्डर नहीं थे, न भवन मालिक, न फायर सुरक्षा अधिकारी और न ही किसी सरकारी विभाग के जिम्मेदार पद पर तैनात थे।
वह एक साधारण कर्मचारी थे, जो दिल्ली में अपने परिवार का पेट पालने के लिए रसोई में खाना बनाने का काम कर रहे थे।
उनका दायित्व भोजन तैयार करना था, न कि भवन की वैधता की जांच करना,
फायर एनओसी की पड़ताल करना या यह सुनिश्चित करना कि सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है या नहीं।
यदि किसी भवन में अवैध निर्माण हुआ, यदि अग्नि सुरक्षा के नियमों की अनदेखी की गई, यदि रिहायशी इलाके में
व्यावसायिक गतिविधियां नियमों के विरुद्ध संचालित हो रही थीं, तो इन सवालों का जवाब उन लोगों से मांगा जाना चाहिए जिनके पास निर्णय लेने और नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी थी।
दुर्भाग्य से हमारे यहां अक्सर बड़े हादसों के बाद सबसे कमजोर कड़ी को पकड़ लेना आसान समझा जाता है।
असली जिम्मेदारों तक पहुंचने में समय, साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति लगती है,
जबकि एक कर्मचारी की गिरफ्तारी से तत्काल कार्रवाई का संदेश देना आसान होता है।
लेकिन न्याय और दिखावटी कार्रवाई में बहुत बड़ा अंतर होता है।
केशव नेगी भी किसी के बेटे हैं, किसी परिवार की उम्मीद हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों से निकलकर रोजगार की तलाश में
महानगर पहुंचे हजारों युवाओं की तरह वह भी अपने सपनों और जिम्मेदारियों का बोझ उठाए हुए थे।
आज उनका परिवार भी उसी पीड़ा और असहायता से गुजर रहा होगा, जिससे किसी भी आम परिवार का सामना ऐसी परिस्थिति में होता है।
यह लेख किसी को दोषमुक्त घोषित करने का प्रयास नहीं है। दोषी कौन है, यह अदालत और निष्पक्ष जांच तय करेगी।
लेकिन यह मांग अवश्य है कि जांच तथ्यों और जिम्मेदारियों के आधार पर हो, न कि केवल किसी एक कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर।
उत्तराखंड सरकार, प्रदेश के सांसदों और जनप्रतिनिधियों को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए।
यदि केशव नेगी आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें उचित कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि उनकी बात भी अदालत तक पूरी मजबूती से पहुंच सके।
साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी जिम्मेदार पक्षों तक पहुंचे।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि वह कमजोर और साधनहीन व्यक्ति के साथ भी उतना ही न्याय करे, जितना शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों के साथ करती है।
क्योंकि न्याय का मूल सिद्धांत यही है — जिम्मेदारी उसी की तय होनी चाहिए, जो वास्तव में जिम्मेदार हो।


















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