पेड़ की टूटी शाखा ने खींचा ध्यान
उस दिन मैं अपने परिसर में टहल रहा था। सुबह की धूप पेड़ों की पत्तियों पर चमक रही थी। पक्षियों की आवाजें वातावरण को मधुर बना रही थीं।
तभी, परिसर में घूम रहे किसी व्यक्ति ने एक पेड़ के विषय में कुछ सूचना दी।
मैं भी उस पेड़ को देखने चला गया। पेड़ तो अपनी जगह पर खड़ा था, लेकिन उसकी एक बड़ी हरी-भरी शाखा गायब थी।
नीचे कुछ सूखे पत्ते और लकड़ी के टुकड़े बिखरे पड़े थे। मैं ठिठक गया।
मुझे लगा जैसे किसी ने उस पेड़ का एक अंग काट दिया हो।
शाखा से बनी एक कलम
मैं कुछ देर उसके पास खड़ा रहा। तभी जमीन पर पड़ा शाखा का एक छोटा-सा टुकड़ा मेरी नजर में आया।
मैंने उसे उठा लिया और घर ले आया। मन में विचार आया कि इससे एक कलम बनाई जा सकती है।
मैंने उस टुकड़े को तराशा। सचमुच वह एक सुंदर कलम जैसी बन गई।
शाम को जब मैं कुछ लिखने बैठा तो सोचा कि इस कलम से कोई कहानी लिखी जाए।
लेकिन मुझे कहानी लिखना कभी ठीक से नहीं आया।
मैं वर्षों से लेख, नाटक, रिपोर्ट, संपादकीय आदि लिखता रहा था, पर कहानी लिखना अलग बात थी।
जब कलम ने खुद लिखनी शुरू की कहानी
मैंने कलम हाथ में ली और कागज पर पहला शब्द लिखने की कोशिश की तभी एक अजीब घटना हुई।
कागज पर कुछ शब्द लिखे मिले। कलम मेरे हाथ में थी, लेकिन शब्द मेरे नहीं थे।
कलम स्वयं लिख रही थी। और फिर उसने अपनी कहानी लिखनी शुरू कर दी।
एक शाखा की पीड़ा
“मैं एक कलम नहीं हूं,” उसने लिखा, “मैं उस शाखा का हिस्सा हूं, जिसे पेड़ से अलग कर दिया गया था।
एक समय था जब मैं उस पेड़ की बांह हुआ करती थी। मेरी पत्तियों पर चिड़ियां बैठती थीं।
गिलहरियां मुझ पर दौड़ती थीं।
मैं छाया देती थी। बरसात में मेरी पत्तियां वर्षा की बूंदों को थाम लेती थीं। मुझे अपने जीवन पर गर्व था। लेकिन एक दिन सब बदल गया।
परिसर का एक व्यक्ति मेरे पास आए। वे अक्सर कहते थे कि उन्हें पेड़ों से बहुत प्रेम है। वे पौधों की बातें करते थे। लेकिन इस बार उनके हाथ में आरी थी।
पहले मैंने सोचा कि शायद वे मेरी देखभाल करने आए हैं। लेकिन कुछ ही क्षणों बाद आरी मेरे शरीर में उतरने लगी।
हर वार के साथ मुझे पीड़ा होती थी। मैं चुप थी, क्योंकि मैं बोल नहीं सकती थी।
मैं रो रही थी, क्योंकि शाखाएं चीख नहीं सकतीं। मेरे साथी पत्ते कांप रहे थे। पक्षी घबराकर उड़ गए। और कुछ देर बाद मैं जमीन पर पड़ी थी।
प्रकृति के मित्र या केवल दिखावा?
मैंने ऊपर देखा। मेरा पेड़ अब भी खड़ा था, लेकिन उसकी आकृति बदल गई थी। उसके शरीर पर एक गहरा घाव बन गया था।
मुझे सबसे अधिक दुख इस बात का नहीं था कि मैं कट गई। दुख इस बात का था कि मुझे उस व्यक्ति ने काटा जो स्वयं को प्रकृति का मित्र बताता था।
उस दिन मुझे समझ में आया कि पेड़ों के बारे में भाषण देना और पेड़ों से प्रेम का दिखावा करना दो अलग-अलग बातें हैं।
कुछ लोगों को पेड़ तब तक अच्छे लगते हैं जब तक वे उनकी इच्छा के अनुसार बढ़ते रहें।
जब पेड़ अपनी स्वाभाविक दिशा में बढ़ता है, तब वही लोग आरी उठा लेते हैं।
कानून से बचना आसान, अंतर्मन से नहीं
मैं कलम की कहानी पढ़ता जा रहा था और कलम लिखती जा रही थी।
उसने आगे लिखा-उस व्यक्ति की शिकायत हुई कार्यवाही भी हुई, परंतु वे बच गए। लेकिन क्या सचमुच बच गए?
कानून से बच जाना आसान है।
अपने अंतर्मन से बचना कठिन है।
मैं तो कटकर जमीन पर गिर गई, लेकिन उस दिन एक और चीज कट गई थी, मनुष्य और प्रकृति के बीच का विश्वास।
पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते
आज मैं एक कलम बन गई हूं। पहले मैं पेड़ को जीवन देती थी। अब शब्दों को जीवन देती हूं। मेरी एक ही इच्छा है-
जब भी कोई मेरे द्वारा लिखे गए शब्द पढ़े, वह याद रखे कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते।
वे छाया होते हैं। वे पक्षियों का घर होते हैं। वे हवा की सांस होते हैं। वे पृथ्वी की धड़कन होते हैं। और जो व्यक्ति पेड़ों से सचमुच प्रेम करता है, वह आरी उठाने से पहले सौ बार सोचता है।
कलम का अंतिम संदेश
इतना लिखकर कलम रुक गई।
मैं देर तक कागज को देखता रहा।
मेरे सामने एक कहानी थी। एक ऐसी कहानी जिसे मैंने नहीं लिखा था।
उसे उस शाखा की टहनी से बनी कलम ने लिखा था जो कभी एक हरे-भरे पेड़ का हिस्सा थी।
मैंने धीरे से कलम को मेज पर रखा और अपनी खिड़की से बाहर खड़े पेड़ों को देखने लगा। हवा चल रही थी। पत्तियां हिल रही थीं। मुझे लगा जैसे वे कह रही हों-
“हमें बचाइए, क्योंकि हमारे बिना आपकी अगली कलम भी नहीं बचेगी।”















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