अनसूया प्रसाद मलासी
हिमालय के प्रतिनिधि कवि की साहित्य साधना
कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल का जन्म 20 अगस्त 1919 को तल्ला नागपुर पट्टी के ग्राम मालकोटी में हुआ था।
कवि की असमय मृत्यु के बाद उनके अभिन्न मित्र पं. शंभू प्रसाद बहुगुणा
इनके अधिकांश साहित्य को संकलित कर उसे प्रकाश में लाए हैं।
उन्होंने निराला तथा चंद्र कुंवर बर्त्वाल को आधुनिक हिंदी युग के कवियों में ‘सूर्य’ और ‘चंद्र’ की भांति चमकने वाली प्रतिभा बताया है।
महज 22 वर्ष की उम्र में रची ‘नंदिनी’
कवि की साहित्य प्रतिभा के बारे में इसी से अनुमान लगाया जा सकता है,
मात्र 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने महत्वपूर्ण गीति-काव्य ‘नंदिनी’ की रचना की थी।
नंदिनी की कविताओं में कवि के हृदय की पीड़ा, प्रेम एवं विषाद के दर्शन मिलते हैं-
मेघों में ज्यों इंद्रधनुष की छवि मनमोहन,
इस विषादमय जीवन में ऐसा ही यौवन।
शीत शिशिर में सूरज की सुकुमार तपन सी,
सुख देती हैं किरणें इस मादक यौवन की।
मेघों की लाली सा यह क्षण भर ही का धन,
इंद्रधनुष की छाया सा है यह नवयौवन।।
असमानता के खिलाफ थी कवि की संवेदना
कभी चंद्रकुंवर बर्त्वाल दूर दृष्टि के धनी थे। उनकी कविता की यह संवेदना उन्हें आज से जोड़ती और प्रासंगिकता को रेखांकित करती है।
परिवर्तनीय युग में असमानता आज भी बनी हुई है, यह चिंता उन्हें तब भी थी। प्रगतिशील कवि की यही कामना रही–
रहता हाथ जोड़ जो, उसे गर्व दो तुम,
मनुष्य होकर रहने का, उसे गर्व दो तुम।
सिर ऊँचा कर चलने का, ईश्वर की दुनिया में,
भेद न होवे कोई, रहें स्वर्ग में सभी।
नरक दु:ख न सहे कोई!

बीमारी से जूझते हुए साहित्य साधना जारी रखी
केवल 28 वर्ष 24 दिन की अवधि लेकर एक दैदीप्यमान नक्षत्र का तरुण तपस्वी कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने
मातृभूमि की स्वतंत्रता की तीव्र अभिलाषा सदैव हृदय में रखते हुए, देश के आजाद होने तक
अपनी असाध्य बीमारी के साथ जूझते हुए अपने प्राणों की रक्षा के साथ ही साहित्य की साधना की और यह गीत गाया–
अभी मरण की छाँह न पड़ने दो जीवन में,
अभी प्रलय की बाढ़ न घुसने दो तन-मन में।
कौन जानता, रही अभी भी हो कुछ आशा,
अभी न इतने आँसू भरो, दु:खी चितवन में।।
पंवालिया में समाप्त हुई जीवन यात्रा
इलाहाबाद में अध्ययन और अध्यापन की अवधि में वे क्षय रोग से पीड़ित हो गये और अपने नये गांव बष्टी के निकट पंवालिया गांव लौट आये।
कुछ समय उन्होंने अगस्त्यमुनी में हाई स्कूल में भी अध्यापन कार्य किया। मगर स्वास्थ्य की गंभीर बीमारी के बाद वह पंवालिया लौट आए,
हां 14 सितंबर 1947 को उनके जीवन की इहलीला समाप्त हो गई। उनकी मृत्यु के बाद पंवालिया गांव उपेक्षित हो गया था।
हरीश गैरोला ने जन-जन तक पहुंचाया कवि का काव्य
कविवर चंद्रकुंवर बर्त्वाल के काव्य धन में तल्लीन रहने वाले स्व. हरीश गैरोला (ग्राम- कंडारा, चंद्रापुरी)
जब संगोष्ठियों में कवि की काफल पाक्कू, नंदिनी, रैमासी, जीतू जैसी कविताओं और गीतों को लयबद्ध होकर पढ़ते थे,
तो भाव-विह्वल हो जाते थे। यह साहित्यिक क्षेत्र का दुर्भाग्य कहें,
प्रकृति का एक और युवा नक्षत्र कवि हरीश गैरोला भी असमय काल का ग्रास बन बैठा।
इस तरह एक सितारा, जो चंद्र कुंवर के काव्य को जन-जन से जोड़ने के लिए कटिबद्ध था,
वह सितारा भी सदा के लिए अस्त हो गया।
पंवालिया को साहित्यिक तीर्थ बनाने की मांग
चंद्रकुंवर बर्त्वाल स्मृति शोध संस्थान और राजनीतिक लोगों ने प्रारंभिक काल में कवि की संपूर्ण रचनाओं को
संकलित कर उनके पुनर्प्रकाशन और उनके जन्म स्थान मालकोटी और रचना भूमि,
जहां उन्होंने अपनी अथाह साहित्य की रचना की और देह त्यागी… डमार गंगा और मंदाकिनी नदी के संगम पर स्थित पंवालिया को रचनाकारों का तीर्थ बनाने की घोषणा की थी।
पैतृक मकान को संग्रहालय बनाने की अपील
पहाड़ के रचनाकार समय-समय पर कहते रहते हैं कि अभी भी समय है,
पंवालिया में स्थित कवि चंद्र कुंवर के खंडहर हो चुके पैतृक मकान पर भले ही नया घर बना दिया गया हो,
उसे पूर्ववर्ती बनाकर रचनाकारों के लिए एक वृहद संग्रहालय बनाया जाना चाहिए,
अन्यथा कवि की आत्मा ‘काफल पाक्कू’ पक्षी के गान की भांति भटकती प्रतीत होती रहेगी।




















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