मंच पर राहुल गांधी थे, सामने बड़ी संख्या में छात्राएं और उनके बीच थीं ऐसी कहानियां, जिनमें राजनीति से ज्यादा रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष सुनाई दिया।
22 अगस्त को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में छात्राओं ने पढ़ाई, रोजगार, सुरक्षा, हॉस्टल,
महंगी शिक्षा और महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न जैसे मुद्दे खुलकर सामने रखे।
किसी ने बताया कि पढ़ने के लिए परिवार से लड़ना पड़ा, किसी ने रास्ते में छेड़छाड़ का दर्द सुनाया।
किसी ने आदिवासी छात्रावासों की बदहाली का मुद्दा उठाया तो किसी ने कहा कि लाखों रुपये की फीस गरीब परिवारों के बच्चों के सपनों के रास्ते में खड़ी है।
यानी मंच पर सवाल अलग-अलग थे, लेकिन उनकी जड़ एक ही थी—क्या बेटियों को अपनी जिंदगी और अपने सपनों का फैसला खुद करने की पूरी आजादी और सुरक्षित माहौल मिल रहा है?
‘पढ़ना है तो शादी कर लो…’
तेजस्विनी की कहानी शायद इस सवाल को सबसे सीधे सामने रखती है।
उन्होंने राहुल गांधी को बताया कि वह एक छोटे गांव से आती हैं।
बेसिक शिक्षा के बाद आगे पढ़ना चाहती थीं, लेकिन परिवार की ओर से
उन्हें कहा गया कि अगर पढ़ना है तो शादी कर लो और ससुराल जाकर पढ़ाई पूरी करना।
तेजस्विनी ने शादी के बजाय काम और पढ़ाई दोनों को चुना। वह पिछले करीब पांच साल से नौकरी और पढ़ाई साथ कर रही हैं।
दोस्तों ने आने-जाने के लिए उन्हें साइकिल दी, लेकिन पढ़ाई और नौकरी तक पहुंचने वाला रास्ता भी उनके लिए आसान नहीं रहा।
उन्होंने बताया कि साइकिल से आते-जाते उन्हें छेड़छाड़ और बदतमीजी का सामना करना पड़ता है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह थी कि वह विरोध करने से डरती हैं।
उन्होंने महिला पहलवानों के मामले का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि जब बड़े स्तर पर आवाज उठाने वालों की सुनवाई नहीं हुई तो उनकी आवाज कौन सुनेगा?

तेज बुखार में भी आंदोलन से मंच तक पहुंची निशा
आदिवासी छात्रा निशा की कहानी और भी गंभीर सवाल लेकर सामने आई।
तेज बुखार के बावजूद निशा कार्यक्रम में पहुंचीं। वह पुणे के मांजरी क्षेत्र में आदिवासी छात्रों के आंदोलन से सीधे राहुल गांधी के कार्यक्रम में आई थीं।
उन्होंने कहा कि वह अपनी बात मराठी में रखेंगी,
ताकि यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत समस्या न रहे बल्कि महाराष्ट्र के आदिवासी विद्यार्थियों की आवाज बने।
निशा ने आदिवासी हॉस्टल में रहने की उम्र सीमा बढ़ाने की मांग उठाई।
उन्होंने हॉस्टल की सुविधाओं, भोजन और आश्रमशालाओं में बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए।
उन्होंने केंद्रीय रसोई व्यवस्था का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि एक जगह तैयार किया गया
खाना कई किलोमीटर दूर तक भेजा जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता और छात्रों के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
हॉस्टल में छात्राओं के कथित प्रेग्नेंसी टेस्ट का सवाल
निशा ने छात्राओं से जुड़े एक बेहद गंभीर आरोप का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि छुट्टियों के बाद हॉस्टल लौटने वाली छात्राओं से फिटनेस सर्टिफिकेट के नाम पर प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया जाता है।
यह सवाल सामने आते ही छात्राओं की सुरक्षा से आगे बढ़कर सम्मान, निजता और संस्थागत जवाबदेही का मुद्दा बन गया।
निशा की बात सुनने के बाद राहुल गांधी ने उनके आंदोलन में साथ देने की बात कही और कहा कि जरूरत पड़ने पर वह उनके साथ धरने पर बैठेंगे।
13 साल की उम्र में सुचित्रा ने झेला उत्पीड़न
पालघर के वसई की अर्थशास्त्र की छात्रा सुचित्रा पागी ने अपनी जिंदगी का एक पुराना लेकिन बेहद परेशान करने वाला अनुभव साझा किया।
उन्होंने बताया कि 13 साल की उम्र में स्कूल से घर लौटते समय उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
बाद में सार्वजनिक परिवहन में सफर के दौरान भी उन्हें ऐसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।
लेकिन सुचित्रा की बात सिर्फ अपने दर्द तक सीमित नहीं रही।
उन्होंने कहा कि किसी लड़की या महिला के साथ ऐसी घटना होती दिखे तो समाज को तमाशबीन बनने के बजाय आगे आकर मदद करनी चाहिए।
‘सुरक्षा के डर से बेटियों की पढ़ाई रुक जाती है’
मनोविज्ञान की छात्रा मैत्री ने उस सामाजिक सोच पर सवाल उठाया,
जो कई परिवारों को बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर भेजने से रोक देती है।
उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेटियों की सुरक्षा को लेकर परिवारों की चिंता इतनी ज्यादा है कि कई बार उनकी शिक्षा और करियर के अवसर सीमित हो जाते हैं।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि लड़की पढ़ाई में कितनी अच्छी है।
सवाल यह भी बन जाता है कि क्या वह घर से दूर जाकर सुरक्षित रह पाएगी?
मैत्री ने उस सोच पर भी सवाल उठाया जिसमें बेटे को माता-पिता का भविष्य का सहारा और बेटी को शादी के बाद दूसरे घर जाने वाली संतान माना जाता है।
तीन लाख की फीस ने उठाया शिक्षा का सवाल
साइबर सिक्योरिटी की छात्रा प्रज्ञा गावंडे ने शिक्षा की बढ़ती लागत का मुद्दा उठाया।
उन्होंने बताया कि साइबर सिक्योरिटी जैसे आधुनिक क्षेत्रों के प्रतिष्ठित संस्थानों में फीस करीब तीन लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के छात्रों के लिए इस तरह की शिक्षा हासिल करना मुश्किल हो जाता है।
प्रज्ञा ने सरकारी संस्थानों में साइबर सिक्योरिटी जैसे पाठ्यक्रम बढ़ाने और छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था मजबूत करने की मांग रखी।
उन्होंने महिलाओं की तस्वीरों के साथ AI के दुरुपयोग और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे नए खतरे का भी मुद्दा उठाया।
राहुल गांधी ने कहा- ‘ब्रेक द केज’
इन्हीं सवालों के बीच राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि महिला सिर्फ बेटी, पत्नी या मां की पहचान तक सीमित नहीं है। उसकी अपनी पहचान, अपने सपने और अपनी जिंदगी है।
राहुल गांधी ने महिलाओं को नियंत्रित करने वाली सामाजिक सोच के खिलाफ ‘ब्रेक द केज’ यानी ‘पिंजरा तोड़ने’ की बात कही।
उनका संदेश साफ था-महिलाओं के रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन उनकी पहचान किसी दूसरे व्यक्ति के अधीन नहीं होनी चाहिए।















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