5.33 किमी पीछे खिसका खतलिंग; झील ने बढ़ाई चिंता
भिलंगना के छह ग्लेशियरों पर 52 साल का अध्ययन, हालिया दशक में बर्फ पिघलने की रफ्तार कई गुना बढ़ी
नेपाल में ग्लेशियर और पहाड़ी मलबे से जुड़ी विनाशकारी बाढ़ के बाद
हिमालयी राज्यों में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
इसी बीच उत्तराखंड के भिलंगना घाटी से आई नई वैज्ञानिक स्टडी ने खतरे की गंभीरता को सामने रखा है।
टिहरी जिले की भिलंगना घाटी के छह प्रमुख ग्लेशियरों पर 1973 से 2025 तक के आंकड़ों का अध्ययन बताता है कि बर्फ का नुकसान लगातार बढ़ा है।
सबसे बड़ा बदलाव खतलिंग ग्लेशियर में दर्ज हुआ है, जो 1973 से 2024 के बीच करीब 5.33 किलोमीटर पीछे खिसक चुका है।
सबसे अहम बात यह है कि हाल के वर्षों में ग्लेशियरों का नुकसान केवल निचले हिस्सों तक सीमित नहीं रहा।
बर्फ के पतले होने का असर ऊंचाई वाले उन हिस्सों तक भी पहुंच रहा है, जहां सामान्य तौर पर बर्फ जमा होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्लेशियरों की सेहत में व्यापक बदलाव का संकेत है।
नेपाल की त्रासदी ने बढ़ाई चिंता
नेपाल में 26 अगस्त को हुई विनाशकारी घटना के बाद हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों से जुड़े खतरों पर पूरी दुनिया की नजर है।
ताजा रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में मृतकों की संख्या 1,000 से ऊपर पहुंच चुकी है और करीब 4,000 लोग अब भी लापता हैं।
घटना ने हिमालय में ग्लेशियर, चट्टान, मलबे और नदी तंत्र के बीच बढ़ते जोखिम को उजागर किया है।
संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी 1 सितंबर को चेताया कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ते तापमान से ग्लेशियर और जमी हुई जमीन कमजोर हो रही है,
जिससे अचानक बाढ़, झील टूटने और मलबे के बहाव जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि, हर हिमालयी बाढ़ को सीधे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहना सही नहीं होगा।
नेपाल की हालिया घटना में ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ के ढहने से नदी तंत्र में भारी मलबा पहुंचा था।
इसलिए वैज्ञानिक जोखिम को केवल झीलों तक सीमित नहीं मान रहे हैं।
भिलंगना की स्टडी ने दिखाई हिमालय की बदलती तस्वीर
28 अगस्त 2026 को Regional Environmental Change में प्रकाशित अध्ययन में भिलंगना घाटी के छह ग्लेशियरों का विश्लेषण किया गया।
इनमें खतलिंग, फाटिंग, दूधगंगा, रतांगरियां, जोगिन और एक अनाम ग्लेशियर शामिल हैं।
वैज्ञानिकों ने 1973 से 2025 तक के सैटेलाइट आंकड़ों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल का इस्तेमाल कर
ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, ऊंचाई, द्रव्यमान और अग्रभाग के पीछे हटने का अध्ययन किया।
ये छह ग्लेशियर भिलंगना घाटी के कुल हिमाच्छादित क्षेत्र का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं।
खतलिंग 5.33 किलोमीटर पीछे, फाटिंग भी 1.82 किलोमीटर खिसका
अध्ययन में खतलिंग ग्लेशियर सबसे ज्यादा पीछे हटने वाला ग्लेशियर सामने आया।
1973 से 2024 के बीच इसका अग्रभाग करीब 5,333 मीटर पीछे गया।
खतलिंग और फाटिंग ग्लेशियर कभी आपस में जुड़े हुए थे।
अध्ययन के मुताबिक दोनों करीब वर्ष 2000 के आसपास अलग हो गए।
फाटिंग ग्लेशियर भी 1973 से 2024 के बीच करीब 1,825 मीटर पीछे खिसका।
खतलिंग 2024 तक करीब 10 किलोमीटर लंबा था और भिलंगना घाटी का सबसे बड़ा ग्लेशियर बना हुआ है।
इसके लगातार पीछे हटने से घाटी के ग्लेशियर परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है।
हाल के दशक में कई गुना बढ़ा बर्फ का नुकसान
अध्ययन ने 1973-2000, 2000-2014 और 2014-2025 के तीन दौरों की तुलना की है।
इसमें खतलिंग और अनाम ग्लेशियर में हाल के दशक के दौरान द्रव्यमान हानि में करीब चार से पांच गुना तक बढ़ोतरी सामने आई।
2014 से 2025 के बीच खतलिंग में औसत वार्षिक द्रव्यमान हानि करीब -0.53 मीटर वॉटर इक्विवेलेंट रही।
अनाम ग्लेशियर में यह आंकड़ा -0.92 मीटर वॉटर इक्विवेलेंट प्रति वर्ष तक पहुंच गया।
दूधगंगा में इसी अवधि में औसत वार्षिक हानि -0.88 मीटर, फाटिंग में -0.52 मीटर, रतांगरियां में -0.29 मीटर और जोगिन में -0.34 मीटर वॉटर इक्विवेलेंट दर्ज की गई।
यानी हाल के अध्ययन काल में सभी छह ग्लेशियरों में बर्फ के नुकसान का दबाव बढ़ा है।
ग्लेशियर पीछे हटा तो सामने बनी झील
भिलंगना घाटी की दूसरी बड़ी चिंता एक अनाम ग्लेशियर के सामने विकसित हो रही झील है।
यह ग्लेशियर 1973 से 2024 के बीच करीब 760 मीटर पीछे हटा।
ग्लेशियर के पीछे हटने के साथ उसके सामने प्रोग्लेशियल झील विकसित हुई।
2024 तक इसका क्षेत्रफल करीब 0.36 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों ने इसे संभावित रूप से खतरनाक झील बताया है।
यहां GLOF का मतलब ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड है।
इसमें झील को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ, मलबे या मोरेन संरचना टूटने पर बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है।
ऐसे बहाव में केवल पानी ही नहीं होता। इसके साथ चट्टान, मलबा और पेड़-पौधे भी नीचे आ सकते हैं,
जिससे नदी किनारे बसे गांवों, पुलों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान हो सकता है।
उत्तराखंड सरकार भी ग्लेशियल झीलों की निगरानी बढ़ा रही
यह चिंता केवल वैज्ञानिक शोध तक सीमित नहीं है।
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2026 में राज्य के कई ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के सर्वे और मॉनिटरिंग के लिए एजेंसियों के एम्पैनलमेंट की प्रक्रिया शुरू की है।
USDMA ने जून 2026 में उत्तराखंड में कई स्थानों पर हाई-एल्टीट्यूड ग्लेशियल लेक सर्वे और मॉनिटरिंग के लिए
उपकरण, सेवाओं और अभियान सहयोग से जुड़ी निविदा जारी की थी। जुलाई में इसका अपडेट भी जारी किया गया।
इससे साफ है कि ग्लेशियल झीलों का जोखिम अब केवल वैज्ञानिक चर्चा नहीं रह गया है, बल्कि आपदा प्रबंधन की तैयारियों का हिस्सा बन चुका है।
गंगोत्री ग्लेशियर पर भी लगातार निगरानी
उत्तराखंड में गंगोत्री क्षेत्र की भी नियमित निगरानी की जा रही है।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की वेबसाइट पर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी
की 2025 की मासिक और त्रैमासिक ग्लेशियर मॉनिटरिंग रिपोर्ट उपलब्ध हैं।
इनमें अप्रैल-जून, जुलाई-सितंबर और अक्टूबर-दिसंबर 2025 की त्रैमासिक रिपोर्ट के साथ कई महीनों की अलग-अलग प्रगति रिपोर्ट शामिल हैं।
गंगोत्री क्षेत्र में जिला और तकनीकी टीमों के सर्वे भी संभावित जोखिमों और चेतावनी के लिए किए जाते रहे हैं।
सिर्फ उत्तराखंड नहीं, पूरे हिमालय में बदल रही बर्फ की तस्वीर
मार्च 2026 में ICIMOD की दो बड़ी रिपोर्टों ने भी हिमालय के लिए चिंता बढ़ाई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के बर्फ नुकसान की रफ्तार वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है।
1990 से 2020 के बीच पूरे हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में करीब 12 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
रिपोर्ट ने यह भी बताया कि 1975 के बाद कुछ क्षेत्रों में बर्फ की मोटाई में कुल 27 मीटर तक की कमी सामने आई है।
ICIMOD के 50 साल के ग्लेशियर मॉनिटरिंग विश्लेषण में दर्ज वर्षों के करीब 89 प्रतिशत में ग्लेशियरों का मास बैलेंस नकारात्मक रहा।
यानी लंबे समय में बर्फ जमा होने के मुकाबले नुकसान का दबाव ज्यादा रहा है।
बर्फ कम हुई तो आगे पानी का संकट भी बढ़ सकता है
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल बाढ़ का खतरा नहीं बढ़ाता। इसका दूसरा पहलू भविष्य की जल सुरक्षा से जुड़ा है।
ICIMOD की अप्रैल 2026 की स्नो अपडेट रिपोर्ट में हिंदूकुश हिमालय में मौसमी बर्फ की स्थिति सामान्य से 27.8 प्रतिशत कम बताई गई।
यह लगातार चौथा वर्ष था, जब बर्फ का स्तर सामान्य से नीचे रहा।
शुरुआती दौर में ज्यादा पिघलाव कुछ नदियों में पानी बढ़ा सकता है।
लेकिन लंबे समय तक ग्लेशियर सिकुड़ते रहे तो गर्मियों और सूखे मौसम में प्राकृतिक जल भंडार कमजोर पड़ सकता है।
भिलंगना घाटी के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भिलंगना नदी भागीरथी की प्रमुख सहायक नदी है और इसका जल टिहरी जलाशय तथा downstream जल प्रणालियों से जुड़ा है।
नेपाल की त्रासदी से उत्तराखंड के लिए क्या सबक?
नेपाल की घटना को उत्तराखंड के लिए सीधे भविष्यवाणी की तरह देखना सही नहीं होगा।
लेकिन यह जरूर दिखाती है कि हिमालयी आपदा केवल एक जगह का स्थानीय संकट नहीं रह सकती।
उत्तराखंड में भी ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, नई झीलें विकसित हो रही हैं और हाल के वर्षों में बर्फ के नुकसान की दर बढ़ी है।
भिलंगना की नई स्टडी इसी बदलाव का वैज्ञानिक प्रमाण देती है।
अब जरूरत केवल यह पता लगाने की नहीं है कि कौन-सा ग्लेशियर कितना पीछे हट रहा है।
जरूरत यह जानने की भी है कि उसके नीचे की घाटी में कितनी आबादी है,
कौन-से पुल और सड़कें जोखिम में हैं, कौन-सी जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं,
और खतरा बढ़ने पर चेतावनी कितनी जल्दी लोगों तक पहुंच सकती है।
हिमालय की बर्फ सिर्फ पहाड़ों पर जमा पानी नहीं है। यही बर्फ आने वाले वर्षों की जल सुरक्षा भी है और तेजी से बदलती इसकी स्थिति आपदा प्रबंधन के लिए भी चेतावनी है। भिलंगना की नई स्टडी और नेपाल की ताजा त्रासदी ने इस चेतावनी को और गंभीर बना दिया है।


















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