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मनचाहा आदेश न मिलने पर जजों पर आरोप लगाना खतरनाक प्रवृत्ति: CJI

सुप्रीम कोर्ट ने जजों के खिलाफ बढ़ते ‘स्कैंडलस आरोपों’ पर गहरी नाराज़गी जताई

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 11 नवम्बर को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान उन वकीलों और याचिकाकर्ताओं पर कड़ा रुख अपनाया, जो अदालत से मनचाहा आदेश न मिलने पर जजों के खिलाफ अनुचित और बेबुनियाद आरोप लगाने लगते हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस प्रवृत्ति को “अत्यंत गलत और खतरनाक” बताया।

CJI गवई ने सुनवाई के दौरान कहा कि हाल के समय में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है कि निर्णय पक्ष में न आने पर कई लोग या वकील जज की नीयत पर सवाल उठाते हुए आपत्तिजनक टिप्पणियां कर देते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे आरोप न केवल न्यायपालिका की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाते हैं, बल्कि अदालतों की गरिमा और निष्पक्षता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

पीठ ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि अदालतें ऐसी गलत परंपराओं को किसी भी रूप में प्रोत्साहित नहीं करेंगी और ज़रूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई करने में हिचक नहीं दिखाएंगी।

क्या है मामला

रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला तेलंगाना हाई कोर्ट की जज जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य से जुड़ा है। कुछ वकीलों ने अपनी एक याचिका में जज के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां दर्ज की थीं।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई को स्वतः संज्ञान लेते हुए संबंधित वकीलों को अवमानना का नोटिस जारी किया था।

इस मामले की सुनवाई सोमवार को हुई, जिसमें वकीलों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी मांगी। जस्टिस भट्टाचार्य ने भी माफी स्वीकार कर ली।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी उदारता बरतते हुए मामला समाप्त कर दिया, लेकिन साथ ही चेतावनी भी जारी की।

वकील अदालत के अधिकारी हैं, उन्हें जिम्मेदारी निभानी होगी: सुप्रीम कोर्ट

पीठ ने कहा कि वकील अदालत के अधिकारी होते हैं और उन्हें किसी भी याचिका या हलफनामे पर हस्ताक्षर करने से पहले उसकी भाषा और सामग्री की गहन समीक्षा करनी चाहिए।

बेबुनियाद या अपमानजनक आरोप लिखना न केवल अवमानना की श्रेणी में आता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी दूषित करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही 23 जुलाई के अपने एक निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें अदालत ने कहा था कि छोटी-छोटी पेशेवर गलतियों के लिए वकीलों को अनावश्यक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनके करियर और प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

लेकिन अपमानजनक भाषा और निराधार आरोप किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य ने माफी स्वीकार कर अपनी उदारता दर्शाई है। अदालत ने टिप्पणी की कि इस प्रकार के मामलों में न्यायाधीशों का धैर्य और संयम न्याय व्यवस्था को मजबूत करता है, लेकिन ऐसे उदाहरणों को सामान्य नहीं माना जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश व्यक्तिगत अपमान का जवाब देने के लिए सार्वजनिक मंच पर नहीं जा सकते।

इसलिए वकीलों और याचिकाकर्ताओं को यह समझना होगा कि उनके शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले आरोप पूरे सिस्टम को कमजोर करते हैं।

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