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साहित्यकार डॉ. अतुल शर्मा ने साझा किए हिमालयी जड़ी-बूटियों से जुड़े संस्मरण

देश के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अतुल शर्मा की रेडियो नाटकों की पुस्तक ‘उन्नीस नाटक’ एक बार फिर चर्चा में है।

पुस्तक के माध्यम से उन्होंने उत्तराखंड की पारंपरिक जड़ी-बूटियों, रेडियो लेखन और हिमालयी औषधीय

वनस्पतियों के संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए हैं।

‘उन्नीस नाटक’ के जरिए जड़ी-बूटियों का संदेश

डॉ. अतुल शर्मा ने बताया कि ‘सेंटर फॉर एनवायरमेंट एजुकेशन’ (CEE) के लिए औषधीय जड़ी-बूटियों के

पारंपरिक ज्ञान पर आधारित जन-जागरूकता रेडियो कार्यक्रम तैयार किया गया था। इसी क्रम में उन्होंने बेहद

कम समय में कई रेडियो नाटक लिखे, जिन्हें आकाशवाणी पर प्रसारित किया गया और श्रोताओं ने खूब सराहा।

उनके चर्चित नाटकों में ‘जंगल का प्रसाद’, ‘अदरक तुलसी’, ‘रसोई से रसायन’, ‘जड़ी-बूटी संवाद’, ‘संजीवनी’ और

‘बुंरास’ जैसे शीर्षक शामिल हैं, जिनके माध्यम से आयुर्वेद और लोकज्ञान को सरल शैली में लोगों तक पहुंचाया गया।

जड़ी-बूटियों के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा

डॉ. शर्मा ने हिमालयी क्षेत्रों में जड़ी-बूटियों के लगातार हो रहे दोहन पर चिंता जताई।

उन्होंने पर्यावरणविद् अनिल जोशी के हवाले से बताया कि च्यवनप्राश में उपयोग होने वाली कई औषधीय

वनस्पतियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं।

उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र की कई प्रजातियां ‘रेड लिस्ट’ में शामिल हो चुकी हैं और देशभर में सैकड़ों औषधीय

वनस्पतियां संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच गई हैं।

माणा गांव में पारंपरिक उपचार का अनुभव

अपने संस्मरण में डॉ. शर्मा ने बताया कि एक बार माणा गांव में उनकी तबीयत खराब हो गई थी।

उस दौरान गांव की एक स्थानीय महिला ने पारंपरिक जड़ी-बूटियों से उनका उपचार किया,

जिससे उन्हें काफी राहत मिली। उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्रों में आज भी पारंपरिक औषधीय ज्ञान जीवित है।

कंडाली के पकौड़ों का स्वाद आज भी याद

उत्तराखंड आंदोलन के दिनों को याद करते हुए डॉ. शर्मा ने बताया कि नई टिहरी में प्रभात फेरी के दौरान उनके हाथ में बिच्छू घास यानी कंडाली लग गई थी,

जिससे तेज जलन होने लगी। बाद में उनके मित्र दिवंगत पत्रकार राजेन टोडरिया ने पारंपरिक तरीके से उपचार किया।

उन्होंने बताया कि कुछ समय बाद राजेन टोडरिया के घर पर उन्हें कंडाली के गरमा-गरम पकौड़े खाने को मिले, जिनका स्वाद आज भी उन्हें याद है।

कोरोना काल में फिर याद आई पारंपरिक रसोई

डॉ. शर्मा ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों ने फिर से काली मिर्च, अदरक और तुलसी जैसी पारंपरिक चीजों का महत्व समझा।

उन्होंने अपनी अम्मा जी को याद करते हुए कहा कि पेट दर्द जैसी समस्याओं में वे हींग और अजवाइन से ही उपचार कर देती थीं।

उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों की पारंपरिक जीवनशैली और जड़ी-बूटियों का ज्ञान केवल उपचार नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ी एक समृद्ध संस्कृति का हिस्सा है।

https://regionalreporter.in/dm-swati-bhadauria-takes-a-strict-stance-during-janata-milan/
https://youtu.be/P4dYKabSTrA?si=gKwv1lXqDCdnCAvG
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